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उच्च शिक्षा में महिलाओं की हिस्सेदारी उतनी अच्छी नहीं और ना ही उसमे कोई ख़ासा सुधार आया है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन 2017-18 के आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल 903 विश्वविद्यालय में से सिर्फ 15 महिला विश्विद्यालय हैं।

राजस्थान में 4, तमिलनाडु में 2, और आंध्र प्रदेश, असम, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, उत्तराखंड व पश्चिम बंगाल में केवल 1-1 ही महिला विश्वविद्यालय हैं।

उच्च शिक्षा में कुल नामांकन का अनुमान लगाया जाए तो 36.6 मिलियन में 19.2 मलियन लड़के और 17.4 मिलियन लड़कियां हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में उच्च शिक्षा में लड़कियों के मुकाबले लड़कों कि भागीदारी अधिक है।

उच्च शिक्षा में अनुमानित ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो (जीईआर) कुल 25.8 प्रतिशत है। भारत में लड़कों कि जनसंख्या के लिए जीईआर 26.3 प्रतिशत है वही लड़कियों के लिए ये संख्या 25.4 प्रतिशत है।

साल 2012 में UGC ने उच्च शिक्षा में महिला भागीदारी को बेहतर बनाने के लिए महिलाओं के लिए 20 महिला विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव दिया था। इस स्कीम के अंतर्गत कुल 800 महिला कॉलेज भी खोलने की बात प्रस्तावित की गई थी। यानी लगभग हर राज्य में ऐसे 20 कॉलेजों के स्थापना का प्रस्ताव था।

साथ ही प्रस्ताव में लिखा हुआ था कि ये कॉलेज बुनियादी ढांचे, हॉस्टल, खेल के मैदान, पुस्तकालय और प्रौद्योगिकी कक्षाओं से लैस होंगे। और इसके लिए केंद्र 100 प्रतिशत फंड देगा जैसा कि वर्त्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय को दिया जाता है।

लेकिन ये प्रस्ताव केवल कागज़ों में सीमित रह गया। इन सात सालों में अब तक कोई तरक्की नहीं हुई है। साल 2014-15 तक 11 और 2015-16 से अब तक सिर्फ 15 विश्वविद्यालय ही विषेशरूप से महिलाओं के लिए बनाए जा सके हैं। जबकी ऐसा भी नहीं कि भारत में विश्वविद्यालय का निर्माण रुक गया हो। 2016-17 में 864 विश्वविद्यालय थे जो 2017-18 में 903 हो गए हैं।

अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम में एडमिशन लेने वालों में जहां 51.9 प्रतिशत हिस्सेदारी लड़कों की है वही लड़कियां 48.1 प्रतिशत है। श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसे यूनिवर्सिटी भारत में महिलाओं के लिए बनी पहली यूनिवर्सिटी है जो कि मुंबई में स्थित है। 2016 में इस विश्वविद्यालय ने अपने 100 साल पूरे किए।