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महिला और पुरुष की बराबरी की बात करने वाला नारीवाद एक बेहद ही खूबसूरत विचारधारा है मगर इस जातिवादी देश में ये विचारधारा भी विकृत हो जाती है।

महिला-पुरुष में बराबरी की चाह रखने वाले नारीवादी भी जाति के आधार पर गैर-बराबरी बनाए रखना चाहते हैं।

महिलाओं के हक की बात करने वाले बाबा साहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले जैसे आइकॉन को कभी फेमिनिज्म का चैंपियन नहीं बताया जाता क्योंकि नारीवादी विचारधारा पर भी जातिवादी सवर्णों का कब्ज़ा है – चाहे वो स्त्री हों या पुरुष ।

इसी हिप्पोक्रेसी से नाराज़ दीपाली तायडे ने सोशल मीडिया पर अपने विचार साझा किए हैं-

पढ़े- दीपाली तायडे का लेख-

”उफ़्फ़ फेमिनिज़्म……..

लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोलने वाले, स्त्री शिक्षा की पैरोकारी करने वाले, स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने वाले विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने वाले, बालविवाह का विरोध करने वाले, लड़कियों के लिए आश्रम खोलने वाले, बच्चे गोद लिए जाने का उदाहरण रखने वाले, बलात्कर की शिकार महिलाओं को सहारा और सम्मान देने वाले …….देश में स्त्री अधिकारों के जनक ज्योतिबाफुले और सावित्रीबाई फुले हैं।
आज ज्योतिबा फुले का स्मृतिदिवस है……..

भारतीय फेमिनिस्टों(सारे सवर्ण हैं एक लाइन से) के मुँह से इनके लिए धन्यवाद तो क्या, नाम भी नहीं निकलेंगे क्योंकि फुले दम्पत्ति या अम्बेडकर नाम लेने में भी छूत लगती है। चूँकि भारत में स्त्री अधिकारों की शुरुआत और संघर्ष करने वाले बहुजन समुदाय के हैं इसलिए सवर्ण फेमिनिज़्म को फेमिनिस्ट थियोरी बाहर से आयात करना पड़ता है। बहुजनों का नाम ले लेंगे तो फेमिनिज़्म भी अपवित्र हो जाएगा।

जातिवादी फेमिनिज़्म में बहुजन अब भी अछूत हैं”