उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 जुलाई से राज्य में कांवड़ यात्रा होने का ऐलान कर दिया है। इस मामले में योगी सरकार और केंद्र सरकार के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। योगी सरकार हर हाल में कांवड़ यात्रा का आयोजन करने की बात कह रही है।

वहीं केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार को इस फैसले पर दोबारा विचार विमर्श करने की सलाह दी है।

योगी सरकार का कहना है कि कांवड़ यात्रा के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का का पालन किया जायेगा। इसका पूरा प्रबंध किया जाएगा। इस मामले में विपक्षी दलों ने योगी सरकार के फैसले का विरोध किया है।

शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए कावड़ यात्रा के फैसले को लेकर योगी सरकार पर निशाना साधा है।

सामना में शिवसेना ने कहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोरोना की तीसरी लहर का खतरा होने के बावजूद राज्य में कांवड़ यात्रा को मंजूरी दी है।

भले ही कावड़ यात्रा हिंदू लोगों की आस्था का विषय है। लेकिन कांवड़ यात्रा में भीड़ की बाढ़ आएगी। इसके बाद इस बाढ़ में भक्तों के शव बहेंगे।

शिवसेना का कहना है कि उत्तराखंड सरकार ने कोरोना महामारी में कांवड़ यात्रा पर रोक लगाने का फैसला लिया है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही भाजपा शासित राज्य हैं। लेकिन दोनों राज्यों की सरकारों की मत अलग है।

कांवड़ यात्रा में सिर्फ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं। साल 2019 में हुई कावड़ यात्रा के दौरान करीब डेेेढ़ करोड़ लोग हरिद्वार पहुंचे थे।

गौरतलब है कि ऐसे भी अगर इतनी भारी-भरकम भीड़ इस बार भी जुटती है तो यह खतरे का संकेत हो सकता है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार के संकेतिक कांवड़ यात्रा करवाने वाले फैसले पर सुनवाई करते हुए कहा है कि महामारी के दौरान राज्य के हर तरह के धार्मिक आयोजनों पर रोक लगी हुई है।

ऐसे में कांवड़ यात्रा होनी चाहिए या नहीं। इस पर योगी सरकार को दोबारा विचार करने का मौका दिया जाता है। कोर्ट ने इस संदर्भ में योगी सरकार को 19 जुलाई तक का समय दिया है।

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