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TANYA YADAV

कोरोना माहमारी के फैलने से न केवल देश की अर्थव्यवस्था को झटका लगा है, बल्कि इस दौरान देश की आधी आबादी को भी गहरी चोट पहुंची है। जिन्हें लगता है कि महिलाएं घरों में सुरक्षित रहती हैं, उनकी सोच को भी धक्का लगा है। क्योंकि महिलाओं को पाबंदियों में रखने का पैरोकार समाज बुरी तरह एक्सपोज़ हुआ है।

नेशनल कमीशन फ़ॉर वीमेन (NCW) के मुताबिक, पिछले 8 महीनों में महिलाओं के साथ सबसे ज़्यादा अपराध जून में हुए हैं। मतलब कि जब ज़्यादातर समय लोग अपने घरों में बंद थे, तभी महिलाओं पर सबसे ज़्यादा अत्याचार किए गए।

NCW के मुताबिक जून महीने में महिलाओं के साथ 2043 आपराधिक घटनाएं घटी थीं। ये महज़ उतने ही आपराधिक मामले हैं जिन्हें NCW में दर्ज करवाया गया था। इनमें से 452 मामले घरेलू हिंसा के हैं। इसका मतलब है कि इन महिलाओं के लिए इनके घर भी सुरक्षित नहीं है।

इसके अलावा जून महीने में महिलाओं पर मानसिक और भावनात्मक शोषण के 603 मामले दर्ज हुए हैं। इन महिलाओं के “गरिमा के साथ जीने” के अधिकार का हनन हुआ है।

विवाहित महिलाओं के उत्पीड़न और दहेज उत्पीड़न से जुड़ी 252 शिकायतें दर्ज की गई हैं। 100 मामले साइबर क्राइम से जुड़े हैं। 78 मामलें बलात्कार और बलात्कार के प्रयास से जुड़े हैं।

एक ट्विटर यूजर का कहना है “ये आंकड़े बस उन्हें महिलाओं के बारे में बताते हैं जिन्हें NCW के बारे में पता है। असल आंकड़े इससे कहीं ज़्यादा हैं।”

मामलों का दर्ज होना और महिलाओं का अपने लिए आवाज़ उठाना ज़रूरी है। लेकिन ये समझना भी ज़रूरी है कि महिलाओं को घरों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें घरों में कैद करना गलत है। ये अपने आप में एक अपराध है जो शायद करोड़ों महिलाएं किसी NCW में दर्ज ही नहीं करवाती हैं।

महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने की ज़रूरत है, पितृसत्तात्मक सोच बदलने की ज़रूरत है लेकिन महिलाओं को कैद करने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है।

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