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जब भारत बन रहा था… देश को लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के लिए संविधान का निर्माण हो रहा था। उसी दौरान संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भविष्य के कुछ खतरों के बारे में देश को आगाह किया था।

25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में डॉ भीमराव अंबेडकर ने भारतीय लोकतंत्र पर आने वाले तीन बड़े खतरों का जिक्र किया था। उन तीन खतरों में से एक था ‘नायक पूजा’

डॉ अंबेडकर अपने अपने भाषण में साफ कहा था कि ‘धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है लेकिन राजनीति में, भक्ति या नायक पूजा पतन का निश्चित रास्ता है और जो आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है’

त्रासदी की बात ये है कि डॉ अंबेडकर ने जिस खतरे से बचने के लिए हमें 70 साल पहले आगाह किया था, आज हम उसकी चपेट में हैं। राजनीति के कथित नायकों की भक्ति में नागरिकों के लीन रहने का लंबा इतिहास है। जनता ने पहले नेहरू को नायक की तरह पूजा, फिर इंदिरा को और अब नरेंद्र मोदी को पूज रहा है।

लेकिन यहां ये कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि नरेंद्र मोदी की भक्ति सबसे ज्यादा प्रभावी तरीके से काम कर रहा है। ज्यादा प्रभावी होने के कारण ये भक्ति ज्यादा खतरनाक भी हो चुकी है।

ताजा उदाहरण खतरे की नहीं बल्कि ‘नायक पूजा’ में लाचार एक ‘व्यक्ति’ की है। दरअसल सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है जिसमें एक व्यक्ति प्रधानमंत्री मोदी के लिए इतना भावुक है कि अपनी बात कहते कहते रोने लग रहा है।

व्यक्ति उम्र करीब 35-45 के बीच होगी, देखने में मीडिल क्लास वर्ग का लग रहा है जिसकी जिंदगी में अपने तमामा संघर्ष होंगे। लेकिन वीडियो में पीएम मोदी के काम गिनवा रहा है, कथित उपलब्धियों को गिनवा रहा है, अधूरे सच को पूरे मन से ‘पूरा सच’ बता रहा है और लोगों से मोदी को वोट देने की अपील कर रहा है… लेकिन अपील करते करते इतना भावुक हो जा रहा है कि फूट-फूट कर रोने लग रहा है।

वीडियो देखिए-

किसी नेता से ऐसा लगाव प्रथम दृष्टया अच्छी लग सकती है। लेकिन लोकतंत्र की सेहत के लिए ये भक्ति अच्छी नहीं है। नेता एक सर्विस प्रोवाइडर की तरह होता है, जो हमसे टैक्स लेता है और हमें सुविधाएं देता है। कोई भी नेता अपने घर से लाकर जनता को कुछ नहीं देता। तो फिर इस तरह की भक्ति का कोई कारण ही नहीं बनता। अगर किसी नेता का काम इतना ही अच्छा लग गया है तो उसे दोबारा वोट दे देंगें, रोने की क्या जरूरत है।