केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार के कार्यकाल में देश में होने वाले चुनावों के दौरान ईवीएम हैक का मुद्दा कई बार उठ चुका है। जिसे सरकार द्वारा झुठलाया जाता रहा है।

इस मामले में मोदी सरकार द्वारा सफाई दी जाती है कि ईवीएम को हैक नहीं किया जा सकता। जबकि विपक्षी दलों ने ईवीएम हैक के सबूत भी पेश किए हैं।

इसी बीच भारत के चुनाव आयोग की वेबसाइट हैक किए जाने का मामला तूल पकड़े हुए हैं। बीते दिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने विपुल सैनी नाम के युवक को गिरफ्तार किया है।

जिस पर चुनाव आयोग के अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पासवर्ड के जरिए लॉगिन कर 10 हजार से ज्यादा वोटर कार्ड बनाए जाने के आरोप लगे हैं।

पूछताछ के दौरान सामने आया है कि विपुल सैनी भाजपा शासित मध्यप्रदेश के हरदा निवासी अरमान मलिक के इशारे पर काम कर रहा था। यह काम करने के लिए अब तक विपुल सैनी को 50 लाख रुपए दिए जा चुके हैं।

अब सामने आया है कि विपुल सैनी यह काम अकेले नहीं बल्कि एक बड़ा गिरोह उसके साथ कर रहा था।

चुनाव आयोग की वेबसाइट हैक कर वोटर आईडी कार्ड बनाने का फर्जीवाड़ा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि कई राज्यों में फैला हुआ है। विपुल सैनी के पीछे कई बड़े मास्टरमाइंड बताए जाते हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि वोटर कार्ड बनाए जाने का यह फर्जीवाड़ा काफी लंबे समय से चल रहा था। लेकिन अब तक इस मामले में उच्च स्तरीय जांच के आदेश नहीं दिए गए हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव आयोग और सरकार द्वारा इस मामले में चुप्पी क्यों साधे रखी गई है। दरअसल यह कोई साधारण मामला नहीं है। बल्कि संगीन अपराध है।

गौरतलब है कि साल 2022 में देश के कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले हुए इस फर्जीवाड़े के खुलासे पर जिस स्तर की जांच होनी चाहिए, वो क्यों नहीं की जा रही है? अगर ये फर्जीवाड़ा लंबे समय से चल रहा है। तो देश की चुनाव प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आती है।

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