सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर ने ”फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड ज्यूडिशरी” के मुद्दे पर आयोजित वेबिनार के दौरान मोदी सरकार पर निशाना साधा है।

दरअसल मोदी सरकार के राज में यह प्रचलन बन गया है कि विरोधी स्वरों को दबाने के लिए उन पर राजद्रोह का केस लगा दिया जाता है।

इस मामले में पूर्व जस्टिस लोकुर ने मोदी सरकार को घेरते हुए कहा है कि बोलने की आजादी पर अंकुश लगाने के लिए भाजपा राजद्रोह कानून का सहारा ले रही है। इससे पहले राजद्रोह देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों पर लगाया जाता था।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बोलने की आजादी को खत्म करने के लिए यह सरकार पत्रकारों पर फर्जी खबरें फैलाने के आरोप भी लगा रही है। कोरोना वायरस के मामलों की सच्चाई दिखाने वाले, वेंटिलेटर की कमी जैसे मुद्दों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को फर्जी खबरों के आरोप में फंसाया जा रहा है।

पूर्व जस्टिस का कहना है कि अचानक ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हो गई है। जिसमें लोगों पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए। इस साल में अब तक ऐसे 70 मामले सामने आ चुके हैं। सरकार की सच्चाई सामने लाने वाले एक आम नागरिक पर राजद्रोह का केस लगाया गया। लेकिन ऐसे लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती जो हिंसा की बात करते हैं।

जस्टिस लोकुर ने जेएनयू के छात्र उमर ख़ालिद को गिरफ़्तार किए जाने की निंदा की। उन्होंने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण मामले पर भी बोलते हुए कहा कि उनके बयानों को गलत तरीके से पढ़ा गया।

इसके अलावा पूर्व जस्टिस लोकुर ने गोरखपुर के डॉक्टर कफील खान का उदाहरण भी दिया। जिनपर रासुका लगाई गई। उनके भाषण और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उनके बयानों को गलत पढ़ा गया।

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