चुनाव आयोग की इस लोकसभा चुनाव 2019 में भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग पर सवाल इसीलिए उठा रहा है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महाराष्ट्र के लातूर में बालाकोट एयरस्ट्राइक को लेकर वोट माँगने के साथ-साथ कई बार आचार संहिता तोड़ी लेकिन अबतक आयोग ने मोदी पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

चुनाव आयोग पर उठ रहे ‘प्रश्नचिन्ह’ पर अब खुद चुनाव आयोग के ही सबसे वरिष्ठतम अधिकारी अशोक लवासा खिलाफ हो गए हैं। अशोक लवासा ने चुनाव आयोग की मीटिंग में शामिल होने से साफ़ मना कर दिया है। लवासा ने यह फैसला उनकी बात नहीं मानने के विरोध में किया है। लवासा ने एक पत्र में कहा कि, “मीटिंग में जाने का कोई मतलब नहीं है, इसीलिए दूसरे उपायों पर विचार कर सकता हूं।”

बता दें कि पीएम नरेन्द्र मोदी ने इस चुनाव में कई बार विवादित बयान दिए इसको लेकर अशोक लवासा मोदी के खिलाफ थे। लेकिन चुनाव आयोग मोदी के पक्ष में खड़ा रहा और आयोग ने पीएम मोदी पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसीलिए पीएम मोदी के विवादित बयानों के मामले में आयोग द्वारा क्लीन चिट दिए जाने पर लवासा के ‘फैसले को रिकॉर्ड’ नहीं किया गया।

गौरतबल है कि, चुनाव आयोग ने पीएम मोदी को 6 मामलों में किसी भी पोल कोड के उल्लंघन का दोषी नहीं माना था। चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय कमीशन में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और दो चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और सुशील चंद्रा शामिल थे।

अशोक लवासा ने चुनाव आयोग पर संगीन आरोप लगाते हुए 4 मई को ही पत्र लिख दावा किया था कि, “जब से अल्पमत को रिकॉर्ड नहीं किया गया तब से लेकर मुझे कमीशन की मीटिंग से दूर रहने के लिए दबाव बनाया गया। लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर कहा था, “जब से मेरे अल्पमत को रिकॉर्ड नहीं किया गया तब से कमीशन में हुए विचार-विमर्श में मेरी भागीदारी का अब कोई मतलब नहीं है।”

अशोक लवासा ने पत्र में चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए हैं। साथ ही चुनाव आयोग द्वारा पीएम मोदी के गुजरात में 23 मई को दिए गए भाषण के मामले में क्लीन चिट दे दी थी । इस फैसले पर भी लवासा ने असहमति जताई थी।

मोदी सरकार में सीबीआई VS सीबीआई, जज VS जज के बाद अब चुनाव आयोग VS चुनाव आयोग आमने सामने आ गए हैं। विपक्ष भी मोदी सरकार पर आरोप लगाता रहा है कि इस सरकार ने सरकारी संस्थाओं को बर्बाद कर दिया है।