पंजाब और हरियाणा से दिल्ली की ओर कूच कर रहे किसानों पर न सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई हो रही है बल्कि मीडिया के जरिए भी उन पर हमले हो रहे हैं।

TV9 न्यूज़ चैनल ने किसानों को खालिस्तान का का मोहरा बताने वाला प्रोग्राम चलाया है जिसका चौतरफा विरोध हो रहा है, सोशल मीडिया पर तमाम प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
इसी क्रम में सोशल मीडिया पर एक्लव्य राय लिखते हैं-

यह जो किसानों में भी आप वामपंथी और खालिस्तानी देख लेते हैं तो उसका केवल इतना ही मतलब होता है कि आपने कभी अपने बाप को किसानी करते हुए देखने की जहमत नहीं उठाई है। हाड़ कंपा देने वाली पूस की रातों में जब वह खेत की मेड़ पर केवल एक तिरपाल बिछाकर सोता है तब आप रजाई में घुसकर फेसबुक पर देश/धर्म बचा रहे होते हैं।

जब वह केवल एक फटहा गमछा ओढ़े चमड़ा जला देने वाली गर्मी से दो दो हाथ करते हुए सूखे खेतों को कोड़ रहा होता है तो आप उसी के पसीने की बदौलत कमाए हुए पैसों से किसी एसी संस्थान में दक्षिण बनाम वाम पर बहस कर रहे होते हैं।

जब बिन बारिश किए लौटते बादलों को देखकर उसकी आंखें धुंधली हो रही होती हैं तब आप स्टेटस मेंटेन करने के लिए रेबेन खरीद रहे होते हैं। जब वह फटी हुई बनियान को सुई-धागा से ठीक करने में व्यस्त होता है तब तुम जॉकी और कैल्विन-क्लिन खरीद रहे होते हो।

जब वह अपनी जरूरतों को काटते काटते अपने खैनी खाने को भी सीमित कर रहा होता है तब तुम किसी कैफेटेरिया में कूल डूड्स बने कैपेचीनो पी रहे होते हो।

तो सुनो, अबकी बार जब घर जाना तो बैठना अपने किसान बाप के यहां और उसे ज़रा नजदीक से देखना, उसके चेहरे की झुर्रियों को पढ़ पाना तो पढ़ना, उन झुर्रियों में तुम्हें कोई वामपंथी कोई खालिस्तानी नहीं दिखेगा।

उसमें तुम्हें दिखाई देगा एक किसान जो खाद के लिए परेशान है, जो नहर के पानी को टेल तक लाने के लिए बिलबिला रहा है, जो डीजल का दाम बढ़ने पर अपना सर धुन रहा है, जो उधार चुकाने की जुगत में खून जला रहा है, जो आवारा पशुओं द्वारा फसल नुकसान कर दिए जाने पर हताशा से भरा हुआ है, जो केसीसी की किश्त जमा करने के लिए कहीं और से उधार लेने की कोशिश कर रहा है, जो तुम्हारे जैसे नालायक रीढ़विहीन अपने पुत्र, जिसे किसान वामपंथी और खालिस्तानी दिखता है, को कलेक्टर बना देने का सपना देख रहा है और उसी सपने को पूरा करने के लिए खुद को बैलों की तरह जोत रहा है।

कभी सोचना कि उसके हिस्से क्या आया, जानते हो क्या आया, उसके हिस्से केवल सरकारों के छलावे आये, लाठियां आईं, एमएसपी के नाम पर भद्दा मजाक हुआ और तुम्हारे जैसे पढ़े लिखे गंवारों और क्षद्म राष्ट्रवाद के नशे में चूर धूर्तों के सिद्धांत आए।

अभी भी वक़्त है इस नशे से मुक्त हो जाओ धरतीपुत्र और अपनी जड़ों को पहचानो वरना कमजोर जड़ के साथ तुम कभी भी विशाल वृक्ष नहीं बन पाओगे। देखो कि कैसे सरकार ने तुमको तुम्हारे बाप के खिलाफ ही खड़ा कर दिया है और आज जब उसके ऊपर वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं तब तुम उसी को आतंकी साबित करने को कांख रहे हो।

जब इस बात का मूल्यांकन किया जाएगा कि जब किसानों को उनके खेत में ही मजदूर बनाने की साजिश चल रही थी तब तुम क्या कर रहे थे तो उस वक़्त तुम अपनी ही जड़ों में मट्ठा डालते हुए मिलोगे। इसलिए कुछ देर के लिए ही सही अपनी विचारधारा को कहीं खूंटी/पटनी पर टांग दो और किसानों के ऊपर गिरती इस बेहया और तानाशाही सरकार की लाठियों का पुरजोर विरोध करो क्योंकि यह हम सबके अस्तित्व का मसअला है।

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