आरएसएस (RSS) इन दो लोगों के दबाव में इस कदर आ गया है कि गलत को गलत ओर सही को सही भी नही कह पा रहा है। कल उसने इनके प्रेशर में आकर पांचजन्य को अपना मुख पत्र मानने से इनकार कर दिया, जबकि इसकी स्थापना दीन दयाल उपाध्याय द्वारा वर्ष 1948 में की गयी थी जो भाजपा के पितृ पुरूष और थिंकटैंक कहे जाते हैं, पांचजन्य के संपादकों में केआर मलकानी और अटल बिहारी बाजपेयी भी रह चुके हैं।

दरअसल पांचजन्य ने अपने इस बार के अंक में IT सर्विस कंपनी इन्फोसिस पर 4 पेज की कवर स्टोरी छापी है। इसमें इन्फोसिस के फाउंडर नारायण मूर्ति की फोटो लगा कर ‘साख और आघात’ लिखा है।

आर्टिकल में लिखा गया कि इन्फोसिस की साख और कम बोली के आधार पर आयकर रिटर्न पोर्टल बनाने का दायित्व उसे दिया गया, लेकिन इस पोर्टल में इतनी खामियां हैं कि न सिर्फ रिटर्न भरने वाले लोगों को झटका लगा है बल्कि पूरी व्यवस्था को आघात लगा है।

पांचजन्य ने इंफोसिस पर तीखा प्रहार करते हुए लिखा कि सरकार ने जानी-मानी सॉफ्टवेयर कंपनी को व्यवस्था सरल बनाने का ठेका दिया, लेकिन उसने मामले को उलझा दिया है।

इसमें सवाल पूछा गया कि क्या इंफोसिस अपने विदेशी ग्राहकों के लिए इसी तरह की घटिया सेवा प्रदान करेगी।

यह बात सही भी है दरअसल इंफोसिस को 2019 में आयकर विभाग की नई वेबसाइट तैयार करने का कॉन्ट्रैक्ट 4242 करोड़ रुपये में मिला लेकिन नए ई-फाइलिंग पोर्टल के लॉन्च के 3 महीने होने को आए हैं किंतु इतने दिनों बाद भी पोर्टल में गड़बड़ियों का समाधान नही हुआ है।

और बात सिर्फ इसी पोर्टल की नही है। इंफोसिस ने जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) के भुगतान की सुविधा के लिए जीएसटी नेटवर्क (जीएसटीएन) पोर्टल भी विकसित किया था।

2017 में पोर्टल शुरू होने के बाद कई तकनीकी समस्या आई और 2018 में सरकार ने कंपनी को इसे दूर करने का निर्देश दिया। बावजूद इसके आज तक तक इंफोसिस जीएसटी पोर्टल में आई छोटी छोटी समस्याओ को खत्म नहीं कर पाई है

सारा देश इन दोनों पोर्टल में आने वाली गड़बड़ियों से परेशान है, लोग अपना रिटर्न भी ठीक से दाखिल नही कर पा रहे हैं, सब कुछ उलझा हुआ पड़ा है।

वैसे इस लेख में पांचजन्य ने इंफोसिस पर कई बार “नक्सलियों, वामपंथियों और टुकड़े-टुकड़े गिरोह” की मदद करने का आरोप लगाया गया है।

लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि पत्रिका के पास यह कहने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है, यानी पांचजन्य खुद मान रहा है कि उसके पास इस बात को साबित करने के लिए कोई सुबूत नही है।

इंफोसिस के पाप बस यही समाप्त नही होते हैं। पिछले साल इंफोसिस के तीन कर्मचारियों को धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, आयकर विभाग और इंफोसिस के बीच एक अनुबंध था, जिसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को करदाताओं की गुप्त जानकारियां दी जाती थीं, जब भी संबंधित जानकारियां प्राप्त होती थीं

इंफोसिस के ये कर्मचारी इन्हें आगे की जांच और प्रक्रिया के लिए आयकर विभाग को देते थे, यानी यह कर्मचारी पैसे लेने के लिए उन करदाताओं से व्यक्तिगत सम्पर्क कर लेते थे और उन्हें गोपनीय सूचना उपलब्ध करवा देते थे।

साफ है कि आलोचना सही की गई है और आरएसएस को इस बात से पीछे हटने की कोई जरूरत नही थी, लेकिन इतनी सी बात पर उसने पांचजन्य को अपना मुखपत्र मानने से इनकार कर उसने सिद्ध कर दिया है कि वह अब नागपुर से नही बल्कि गुजरात से ऑपरेट हो रही है।

(ये लेख गिरीश मालवीय के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

one × 1 =