rohith vemula
Rohith Vemula
लक्ष्मण यादव

साथी रोहित!

जय भीम

भरोसा है कि सितारों के बीच ख़ुश होगे. चार साल हो गए तुम्हें देखे. तुम सितारों की सैर का वादा कर गए, तब से हर सितारे में तुम नज़र आते हो. चार साल से तुम्हारी एक ही तरह की तस्वीरें देख रहा हूँ, नई तस्वीरें नहीं देखीं. तुम सितारों के बीच ख़ुश होगे, लेकिन हम तुम्हें आज अपने बीच देखना चाहते हैं. भीतर तो तुम हो ही, काश, बाहर भी होते तो आज बड़ी तिश्नगी से वह लड़ाई लड़ रहे होते, जो देश लड़ रहा है. बहुत कुछ बदल गया दोस्त, आज तुमको याद करते हुए देश लड़ने की अपनी फ़ितरत हासिल कर लिया है. जो एक चीज़ नहीं बदली तो वह है ज़ालिम. आज भी हँस रहा है ज़ालिम.

पता है रोहित, इन चार सालों में बहुत कुछ बदल गया. आज के संघर्षों को तुम देखते तो खिलखिला कर ख़ुश होते क्योंकि आज देश की हर सड़क पर हो रहे संघर्ष का नायक आंबेडकर हैं. आज देश भर के स्टूडेंट्स एसोसिएशन आंबेडकर के बिना कुछ नहीं करते. ध्यान देना, स्टूडेंट्स बोला है लूम्पेन नहीं. रोहित, लेकिन एक दुःख है यार. तुम जिन्हें रोक रहे थे, उन्हें हम आज तक भी रोक नहीं पाए. वे बेख़ौफ़ हमला किए जा रहे हैं. वे सब कुछ रौंद देना चाहते हैं. इसीलिए तुम पर गुस्सा आता है कि ऐसे क्यों चले गए. होते तो मिलकर लड़ते न. ऐसे नहीं जाना था दोस्त. ये शिकायत हर साल करता रहूँगा.

मेरे यार रोहित! हम कभी मिल नहीं पाए, लेकिन पिछले चार सालों में अगर किसी से हर रोज़ मिला तो वह तुम हो. क्योंकि तुममें जो बात दिखी, वह कहीं और नहीं दिखी. एक ईमानदार थी तुममें, वैचारिक भी और ज़ेहनी भी. अगर तुम होते तो तुमको अब तक कई बार डीयू बुला चुका होते. हमने तुम्हारे नाम पर नारे लगाए हैं कि तुम ज़िंदा हो हमारे अरमानों में. पता है, आज तुम्हारे नाम पर कार्यक्रम कर रहे हैं हम. तुम होते तो भाषण देते. टूटी फूटी हिंदी बोलते, ताकि हमारे टूटे ज़ख्म भर पाते. तुम्हारी याद इसीलिए आती है कि पढ़ने के नाम पर तुमने कुछ फ़ेसबुक पोस्ट ही छोड़ रखी और छोड़ा तो एक लेटर.

यार, तुमने अपने आख़िरी पत्र में लिखा कि कोई रोए न. हर बार, हर साल इसी बात से रुलाते हो. मेरी माँ नहीं जानती थी तुम्हारे बारे में. लेकिन उसे हमेशा मुझे लेकर डर बना रहता है. लेकिन जब तुम्हारी माँ को रोते हुए भी लड़ते और हर जगह खड़े देखता हूँ तो उसमें मेरी माँ नज़र आती है. कितना कुछ सहना पड़ा है न इन माँओं को. लेकिन आज जब देश के तमाम ‘शाहीन बागों’ में लड़ती हुई माएँ दिखती हैं, तो ऐसा लगता है कि तुम इन सारी माँओं में ज़िंदा हो दोस्त. ऐसे ही ज़िंदा रहना होगा तुम्हें, जब तक कि हम तुम्हारे और तुम जैसे अनगिनत अनाम शहादत दे चुके लोगों के ख़्वाबों की दुनिया न रच लें. ज़िंदा रहना यूँ ही.

रोहित, पता है तुम जिन ताकतों से लड़ रहे थे न, वे आज बेइंतहा ज़ालिम हो चली हैं. अब लड़ाई ऑयर पर की लग रही है. तुम होते तो साथ लड़ने में कितना जोश रहता. फिर से कह रहा हूँ कि तुम हो. हमारे हर इंक़लाबी क़दम में तुम हो. बहुत कुछ बदला है लेकिन काफी कुछ बदलना बाकी है. अभी लड़ाई जारी है. जारी रहेगी दोस्त. हमारे दुश्मन बहुत होते जा रहे हैं, कई बार बहुत कमज़ोर महसूस करने लगता हूँ ख़ुद को. कई बार अकेला पाता हूँ ख़ुद को. लेकिन जब जब ऐसा महसूस करता हूँ, तब तब तुम भीतर से हिम्मत देते हो. ऐसे ही साथ रहना.

तुम सितारों में रहते हुए भी हमें ऐसे ही रोशनी देते रहना दोस्त. तुम रौशन हो.

जय भीम दोस्त साथी यार रोहित…

(लक्ष्मण यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। देश में चल रहे तमाम जनवादी आंदोलनों के में ये सक्रिय भागीदारी दिखाते हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं)

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