विकाश सिंह मौर्य

अस्सी के दशक में शुरू की गयी 17 सितम्बर की विश्वकर्मा पूजा का उद्देश्य पेरियार की जयंती के उत्सव और उनकी चर्चा को ख़त्म करना था। इस समय तक हिंदी पट्टी में उनकी पुस्तक का ललई सिंह द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ व्यापक चर्चा का विषय बन रहा था। लोकगीतों और चौपाल की चर्चाओं के अलावा चौके से चौकी तक इनकी चर्चा आम हो रही थी।

नसूढ़ी यादव, बेचन राजभर, इलाहाबाद के बलराम मौर्य जैसे बिरहा गायक भी ललई सिंह का रेफरेन्स लेकर ख़ूब गायकी कर रहे थे। उनकी गायकी को ख़ूब पसन्द भी किया जा रहा था। दसों हजार की संख्या में लोग इन्हें सुनने के लिये इकट्ठा हो रहे थे। इसी का मुक़म्मल काउंटर करने के लिये सोलर कैलेंडर पर आधारित एक त्यौहार पैदा करना पड़ा।

उत्तर भारत में ब्राम्हणिकल हेजिमनी को तोड़ने और उसका विकल्प देने की विधिवत शुरुआत सच्ची रामायण के प्रकाशन के बाद ही शुरू हुई है।

इससे हमें उस प्रक्रिया को भी समझने में मदद मिलती है कि किस तरीके से भारत के आग, श्रम और कृषि से सम्बंधित संस्कृति को इस श्रम संस्कृति का इनकाउंटर करने वाले/वाली वैचारिक और भौतिक सृजनात्मक से भरपूर मुनियों/महामहिलाओं/महापुरुषों के योगदानों का काउंटर किया गया।

मक्खलि गोशाल से लेकर तथागत बुद्ध और सिध्दों, नाथों, सूफ़ियों जो गोरखनाथ से कबीर और कबीर से संत तुकाराम, जिजाऊ माता और शिवाजी जैसे लोगों के योगदानों और सामाजिक निर्माण की उनकी भूमिका, उनकी रणनीति को या तो ख़त्म कर दिया गया या लोक से जुड़ी उनकी स्मृतियों को कलमजीवी तबक़े के द्वारा इस तरीक़े से पेश किया गया कि तीनों तरह की सत्ताओं (धार्मिक, व्यापार और राजनीतिक) के पैदाइशी ठेकेदारों के हितों के अनुकूल हो जाय।

पेरियार ने अपनी जीवन यात्रा और अपने अनुभवों के निचोड़ को मौत से दो साल पहले अपने 93वें जन्मदिन के अवसर पर 17 सितम्बर 1971 की सभा में व्यक्त करते हुए कहा था कि, “यद्यपि मैंने जाति को खत्म करने के लिए सभी प्रयास किए हैं। जहां तक ​​इस देश का संबंध है, जाति का उन्मूलन करने का करने का रास्ता भगवान, धर्म, शास्त्रों (ब्राम्हणों को पैदाइशी सुपीरियर और बाक़ी को निम्नतर ठहराने वाली वाहियात क़िताबें) और ब्राह्मणों के उन्मूलन के लिए प्रचार करने से शुरू होता।

जाति केवल तभी गायब हो जाएगी, जब ये चार गायब हो जाएंगे। यदि इनमें से एक भी बची रह गयी, तो जाति को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है… क्योंकि इन चार तत्वों से ही जाति का निर्माण किया गया है… केवल मनुष्य गुलाम बन गया है और इस तरह एक मूर्ख जाति ने अपने को संपूर्ण समाज के ऊपर थोप दिया है।”

पेरियार ने अपनी लेखनी और कार्यों द्वारा यह सिद्ध किया है कि, शोषण का सबसे महत्वपूर्ण हथियार जाति है। चाहे वह स्त्रियों का शोषण हो, किसानों का शोषण हो, दलितों का शोषण हो, या फ़िर भारत में किसी भी समूह या समुदाय के द्वारा किसी भी समुदाय का शोषण हो।

इसे पूरे देश भर में आंदोलनरत महिलाओं और छात्राओं को तथा इनके सहयोगी पुरुषों को भी पेरियार के समय की चुनौतियों, उनपर पेरियार का विश्लेष्ण एवं उनसे निपटने की पेरियार की रणनीति तथा उनके परिणामों को जानना अनिवार्य है। अन्यथा संघर्ष तो करते ही रहेंगे, मनचाहे समाज के निर्माण के लिये। किन्तु रास्ता और लक्ष्य दोनों ही दिवा स्वप्न ही रह जाने की उम्मीद ही सबसे ज़्यादा है।

बीएचयू की लड़कियों को भी पेरियार को और उनके लेखों, उनके कार्यों नहीं भूलना चाहिये। ये एक मनचाहे तार्किक निष्पत्ति से उपजे निष्कर्ष और सम्मानजनक निर्णय तक पहुचने के लिये आवश्यक है।

आज पेरियार की 140वीं जयंती है। ब्रिटिशकालीन भारत और स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली राष्ट्रीय नेता, स्वतंत्र और मानववादी चिंतक, अपने कार्यों से सामाजिक संरचना को मुलभूत रूप से बदल देने वाले, एक कुशल संगठन निर्माता, आंदोलकारी, अपने स्प्ष्ट विचारों और कार्यों के कारण जनता के बीच अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज़ करवाने वाले पेरियार की स्मृतियों को अशेष नमन।

(विकाश सिंह मौर्य, सामाजिक आंदोलनों के इतिहास के शोधार्थी हैैं, ये उनके अपने ज्ञान और अनुभवों से निर्मित निजी विचार हैैं )