सिद्धार्थ रामू

शुक्र है, प्रशांत भूषण ने संघ-भाजपा को 2014 सत्ता में पहुंचाने में अपनी हिस्सेदारी स्वीकार किया और उसके लिए पश्वाताप किया।

आज के दौर में जब आत्मुग्धता चरम पर है और खुद को सही ठहराने की होड़ लगी है, ऐसे समय में प्रशांत भूषण द्वारा इंडिया टुडे के राजदीप सरदेसाई के साथ बात-चीत में यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि पूरा अन्ना आंदोलन बड़े पैमान पर भाजपा- आरएसएस द्वारा समर्थित और आगे बढाया हुआ ( उत्पेरित) था, बल्कि उसी पर टिका हुआ था।

इस समर्थन और उत्प्रेरण का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना और कांग्रेस को सत्ता से हटाना था।

प्रशांत भूषण ने इसमें शामिल होने के लिए पश्चाताप भी व्यक्त किया। यह दीगर बात है कि उन्होंने बड़े भोले तरीके से अन्ना हजारे और खुद का बचाव भी किया और सारा दोष अरविंद केजरीवाल पर मढ़ दिया।

उन्होंने कहा कि अन्ना को भी यह बात पता नहीं थी, कि पूरे आंदोलन के पीछे भाजपा-आरएसएस है। खुद को भी अनजान होने की एक हद तक छूट दिया। लेकिन दावे के साथ यह कहा कि अरविंद केजरीवाल को यह पता था।

कोई तार्किक व्यक्ति उनके इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकता कि उन्हें और अन्ना को नहीं पता था और केजरीवाल को पता था।

खैर देश की आज की हालात में पहुंचाने में अपनी जानी-अनजानी भूमिका के लिए पश्चाताप तो किया और अपना अपराध स्वीकार किया। अच्छी बात है।

अब देखना है कि जो वामपंथी पार्टियां अन्ना आंदोलन की लहर पर चढ़कर उस समय क्रांति करने या क्रांतिकारी जनांदोलन खड़ा करने का सपना देख रही थीं, वे अपने अपराध को स्वीकार करती हैं या नहीं और प्रशांत भूषण के नक्शे-कदम पर चलकर पश्चाताप व्यक्त करती हैं या नहीं।

भूल स्वीकार करने के मामले में वामपंथियों के इतिहास को देखते हुए उम्मीद कम है, लेकिन उम्मीद पर दुनिया टिकी है।

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