महिलाओं की जासूसी का इनका इतिहास पुराना है. लोगों को याद ही होगा गुजरात में 2009 में अमित शाह ने अपने ‘साहब’ के कहने पर बेंगलुरु की एक आर्किटेक्ट युवती की जासूसी की थी.

युवती कहां जा रही है, किनसे मिल रही है, किससे बात कर रही है, कितने कॉल आये, कितनी देर बात हुई शाह इसकी पूरी खबर रखते थे. यहां तक कि होटल, हवाई अड्डा, कार, स्कूटी, शॉपिंग मॉल, जिम हर जगह युवती पर नज़र रखी जा रही थी.

फिर इसका अपडेट उस कथित ‘साहब’ को देते थे. बाद में ये न्यूज़ प्लांट किया गया कि लड़की के पिता के कहने पर जासूसी की गई. ये लोग अपने जान की सलामती चाहते थे, इसलिए गुजरात छोड़ भागे. लड़की का अब तक अता पता नहीं है.

रंजन गोगोई के ऊपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला का प्रकरण उसके आगे की कड़ी है. गोगोई को यौन उत्पीड़न मामले में बचाकर सरकार ने अपने पक्ष में तमाम फैसले करवा लिए.

37 वर्षीय यह महिला अदालत में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम कर रही थीं. महिला कर्मचारी ने मई 2014 में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति पाई थी. इसके बाद अक्टूबर 2018 में उनकी तैनाती तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के आवासीय कार्यालय पर कर दी गई.

महिला कर्मचारी ने यहां उनके साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया और 22 जजों को चिट्ठी लिखी. महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया ही था कि इसके बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया और नौकरी से हटा दिया गया. उनके पति को भी नौकरी से निकाल दिया गया. परिजनों को भी परेशान किया गया.

गोगोई ने छुट्टी के दिन सीजेआई रहते जांच के लिए बोबडे सहित तीन जजों का पैनल बना दिया, खुद को क्लीनचिट भी दिलवा दिया. मीडिया में यह बात रखते रहें वे सख्त फैसले देने वाले हैं इसलिए महिला का इस्तेमाल किया जा रहा है.

लेकिन जिस जस्टिस ए के पटनायक समिति ने कहा कि महिला झूठी नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने उस समिति के रिपोर्ट को ही सार्वजनिक नहीं किया और गोगोई को क्लीनचिट दे दिया.खेल यही से शुरू होता है.

एनआरसी, कश्मीर, अयोध्या, राफेल के फैसले लटके पड़े थे. गोगोई महाभियोग से डर रहे थे. ऐसे ही एक मामले में यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद मध्यप्रदेश के एक जज के खिलाफ महाभियोग लाया गया था.

इस बीच तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद सामने आते हैं और बोलते हैं सीजेआई गोगोई को फंसाया जा रहा है. यही वो टेन्योर था जब गोगोई और मोदी के बीच समझौता हुआ.

सौदा हुआ हम आपको इस केस से बचाएंगे बस आप हमें राफेल, अयोध्या, कश्मीर पर मनचाहा फैसला दो. इसी के बाद से महिला की गतिविधियों पर नज़र रखी गई, जाहिर है गोगोई के कहने पर ये सब किया गया.

इस दौरान महिला को मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, उन्हें डराया गया. चुपचाप नौकरी करने की शर्त पर पिछले साल जनवरी में उन्हें बहाली दी गईं. महिला को आज तक समिति की रिपोर्ट की एक प्रति नहीं दी गई है.

अगर महिला ने झूठा आरोप लगाया था तो उन्हें इसके लिए सजा मिलनी थी, जेल में होना था, जॉब में बहाली नहीं देना था. देश के सामने सच्चाई लानी थी. लेकिन सरकार ने या सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं किया.

मतलब साफ है, महिला सच्ची थीं. सच्ची हैं. उन्हें उस ज्यूडिशरी पर भरोसा था जहां वो काम करती हैं, लेकिन देश की सरकार ने और अदालत ने उन्हें जल्द ही बता दिया तुम देश की उन लाखों महिलाओं में से ही एक हो जो दुष्कर्म के आरोप के बाद या तो सुसाइड कर लेती हैं या दुष्कर्मी की गिरफ्तारी के लिए चक्कर काटती रहती है.

फिर थक हार जाती है. सुप्रीम कोर्ट में काम करने से तुम दूसरी महिलाओं से अलग नहीं हो सकती. और वही हुआ जो होना था. महिला गलत गोगोई बेदाग, महिला गलत सरकार सही, महिला गलत सुप्रीम कोर्ट सही.

महिला के पति हैं, बच्चे हैं. जान जाने का डर है. परिवार की जिम्मेदारी है इसलिए सामने नहीं आ सकती. लेकिन देश के लोगों को अब तो सामने आना चाहिए, जब उनकी निजता का भी मान नहीं रखा इस सरकार ने. हम किस दिन के इंतजार में हैं. ये लोग हमारी माँ-बहनों पर नज़र रख रहे हैं.

(ये लेख विक्रम सिंह चौहान के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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