जनता ‘टरबाइन टेल’ पर मीम बनाती रह जाती है, मुकेश भाई की संपत्ति साल भर में 73% बढ़ जाती है, देश की जीडीपी -24 पर पहुंच जाती है.

क्या ‘टरबाइन टेल’ और ‘बादलों में विमान’ जैसे कारनामे इसीलिए अंजाम दिए जाते हैं कि युवा मीम बनाने में व्यस्त रहें और असली खेल में बाधा न आए?

पेट्रोल के दाम, महंगाई, रुपये ​की कीमत, जीडीपी, अर्थव्यवस्था, शिक्षा वगैरह की बातें करके जिन्हें देश की सत्ता मिली, वे आजकल इन मसलों पर कोई बात नहीं करते. वे कभी बादलों में विमान छुपा देते हैं तो कभी टरबाइन से आक्सीजन बनाते हैं. आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

कभी आपसे वादा किया गया कि देश में शिक्षा पर खूब खर्च करने की जरूरत है ताकि हम विश्व में गुरु निर्यात करके विश्वगुरु बन जाएं. न शिक्षा पर खर्च बढ़ा, न कोई सुधार हुआ.

रोजगार के लिए सड़क पर उतरने वाले युवा लाठी खाते हैं. देश के युवा इस बारे में क्या सोचते हैं?

चुनाव से पहले किसानों और मजदूरों की शान में खूब कसीदे गाए जाते हैं. लेकिन सत्ता में आकर उन्हीं किसानों और मजदूरों के खिलाफ कानून बनाए गए, जिससे पूंजीपतियों को लाभ हो. क्या आप ठगा हुआ नहीं महसूस करते?

बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर इस देश में सरकारें बदली गईं हैं. ये चीजें आज मुद्दा क्यों नहीं हैं? इन्हें लेकर जनता में गुस्सा क्यों नहीं है? क्या ये मुद्दे जनता को उल्लू बनाने का हथियार भर हैं?

हर दिन खेले जाने वाले खेल का नतीजा सिर्फ इतना है कि आम जनता ​किसी के लिए मायने नहीं रखती. न राजनीति के लिए, न मीडिया के लिए. एक को वोट चाहिए, दूसरे को टीआरपी. ये पूरा सिस्टम कॉरपोरेट, राजनीति और मीडिया के गिरोह का बंधुआ है.

(यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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