श्याम मीरा सिंह

इन दो खबरों को पढ़िए, कल सरकार ने संसद में बताया कि प्रधानमंत्री की 58 देशों की यात्राओं पर 517 करोड़ रुपए खर्च हो गए। कल ही सरकार ने संसद में बताया कि श्रमिक ट्रेनों में यात्रा के समय 97 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई। इन श्रमिक ट्रेनों के लिए रेलवे ने 433 करोड़ रूपये किराए की वसूली की।

क्या ये खबर आपको थोड़ी सी भी शर्म महसूस नहीं कराती? प्रधानमंत्री की यात्राओं पर 517 करोड़ खर्च कर दिए गए और प्रवासी मजदूरों से संकट के समय में 433 करोड़ रूपए वसूल कर लिए गए।

सरकार का कहना है कि ये पैसे उसने सम्बंधित राज्य सरकारों से वसूले हैं जबकि उस समय आई खबरों से साफ है कि प्रवासी मजदूरों से टिकटों के पैसे लिए गए हैं, वह भी नार्मल किराए से काफी अधिक।

श्रमिक ट्रेनों में यात्रा के समय 97 नागरिकों की मौत हो गई ये बताता है कि रेलवे और सरकार ने किस तरह मजदूरों को बदइंतजामी पर छोड़ दिया।

ये 97 लोग महज एक संख्या नहीं हैं, वे इस देश के बराबर दर्जे के नागरिक थे जिनके Direct-Indirect टैक्स के पैसों से प्रधानमंत्री की विलासितापूर्ण यात्राओं पर 517 करोड़ का खर्चा कर दिया गया।

कितने अफसोस की बात है 5 ट्रिलियन इकॉनमी का दावा करने वाला प्रधानमंत्री अपने लाखों प्रवासी मजदूरों पर 433 करोड़ रुपए भी खर्च न कर सके।

जबकि वही प्रधानमंत्री अकेले अपनी विदेश यात्राओं पर 517 करोड़ रुपए खर्च कर देते हैं। आखिर क्यों इस देश का राजकोष मजदूरों के नाम पर सूख जाता है, और 40-50 शीर्ष उद्योगपतियों के लिए एक बार में ही 68,600 करोड़ रुपए का लोन Write-off कर देता है।

जिस PM Care को इस महामारी से निपटने के लिए तैयार किया था, जिसमें एक एक कंपनी ने 500-500 करोड़ रुपए दान दिए थे, जिस कोष में प्रधानमंत्री की अपील पर रातों-रात हजारों करोड़ रुपए जमा हो गए, उससे मजदूरों के लिए महज 433 करोड़ रुपए तक नहीं निकले, ये कितने शर्म की बात है।

(यह लेख पत्रकार श्याम मीरा सिंह की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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