यूक्रेन से निकलने की सबसे सुरक्षित सीमा पोलैंड की मानी जाती है। लेकिन सैंकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर पोलैंड की सीमा पर जो हजारों भारतीय छात्र पहुंच रहे हैं उन्हें वहां से भगाया जा रहा है।

निश्चित ही यह मोदी सरकार की कूटनीतिक असफलता को दर्शा रहा है, बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि रेस्क्यू के मामले में पाकिस्तान हमसे कही बेहतर साबित हुआ है।

यूक्रेन में फंसे 2,400 से ज्यादा पाकिस्तानी छात्रों को सुरक्षित पोलैंड पहुंचाया जा चुका है। युक्रेन में कुल तीन हजार पाकिस्तानी छात्र रहते हैं अब उन्हें मात्र 500-600 लोगो को ही निकालना है जबकि हमें अभी भी 15-16 हजार छात्रों को रेस्क्यू करना है।

ऐसे मे पौलेंड के साथ पता नहीं क्या गड़बड़ हो रही है कि वह हमारी मदद नही कर रहा है।

कल शाम को खबर आई हैं कि रुचिर कटारिया नाम के स्वयंसेवक ने ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया कि पोलेंड की सीमा पर मेड्यका को पार करने के इच्छुक भारतीयों से टूटी-फूटी अंग्रेजी में कहा जा रहा है कि ‘‘रोमानिया जाओ।’’

कटारिया ने बताया कि हालांकि, वे पहले ही सीमा तक पैदल चलकर लंबी यात्रा कर चुके हैं और उनके पास सैकड़ों किलोमीटर दूर रोमानिया की सीमा तक पहुंचने का कोई जरिया नहीं है।

भारतीय नागरिक, जो पोलैंड में दाखिल होने में कामयाब रहे, उन्हें पोलिश अधिकारियों और धर्मार्थ संस्थाओं द्वारा स्थापित आश्रयों में रहने के लिए जगह नहीं दी जा रही है।

कल जो भारतीय छात्रों के साथ मारपीट के वीडियो वायरल हो रहे हैं वो यही के हैं।

मोदी के अंधभक्त आपरेशन गंगा के नाम पर लहालोट हो रहे हैं जबकि इनका पसंदीदा अखबार जागरण ही मोदी सरकार की कूटनीति की पूरी पोल खोल रहा है।

जागरण के एक पत्रकार ने युक्रेन में फंसे एक छात्र डा. शिवम के हवाले से पौलेंड सीमा के हाल बताए हैं।

शिवम का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग के दौरान भारत के गायब रहने से यूक्रेन की जनता भारतीयों से काफी नाराज है।

रात गुजारने के लिए पोलेंड बार्डर पर जिस आश्रय स्थल में शिवम सहित भारतीयों को ठहराया गया था, वहां से इसलिए दूसरे ही दिन भगा दिया गया कि वह भारतीय हैं।

डा. शिवम ने पोलेंड बार्डर से वापस लिबिब जाने का निश्चय किया, लेकिन यूक्रेन के टैक्सी ड्राइवर तो भारतीयों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए तैयार नहीं हैं। जबकि अन्य देशों के वाशिदों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा।

ये तो हाल है भारत के छात्रों के और यहां व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर बताया जा रहा है कि जिस गाड़ी पर तिरंगा लगा है उसे रूसी या यूक्रेनी सैनिक खुद बॉर्डर तक पहुंचा रहे हैं।

(यह लेख गिरीश मालवीय की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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