कमाल ख़ान अपने कैमरामैन का नाम पूरे बलाघात के साथ लेते। ऐसा बलाघात कि जिनसे गुज़रते हुए दर्शक आसानी से समझ जाएं कि हमारा पत्रकार जो कुछ भी दिखा-बता रहा है, उसके पीछे कैमरामैन का मन और मेहनत शामिल है।

आप टेलिविज़न के दूसरे नामचीन चेहरे की ज़ुबानी अपने कैमरामैन का जिक़्र करते सुनेंगे, ग़ौर करेंगे तब महसूस कर पाएंगे कि कमाल ख़ान का अंदाज़ कैसे बाक़ियों से ज़ुदा रहा है। कई चेहरे तो रिपोर्ट के दौरान जब कहते हैं मैं अपने कैमरामैन से चाहूंगा कि वो जूम इन करके सामने का नज़ारा भी दिखाएं तो आप साफ़ समझ जाते हैं कि ये शख़्स पत्रकारिता में कैमरामैन जो कि उनसे बराबर और कई बार ज़्यादा हैसियत रखते हैं, कमतर मानता है। वो अपने ही सहकर्मियों के बीच लोकतांत्रिक नहीं है। उसके भीतर बराबरी का भाव नहीं है और तब आप लोकतंत्र, अधिकार और भारी-भरकम बातें कर रहे उस चेहरे से भी छिटक जा सकते हैं।

कमाल ख़ान अपने शहर लखनऊ का नाम जिस अंदाज़ में लिया करते, उस उच्चारण के साथ यह भाव शामिल होता कि हम इसके होने से ही हैं। उस जोर दिए जाने के साथ अनकहे ढंग का एक प्रभावशाली दावा होता। जोर देकर आजतक के रिपोर्टर भी दिल्ली का नाम लेते हैं लेकिन ऐसा कि दिल्ली में जैसे पूरी दुनिया नहीं, आजतक में दिल्ली समा जाय। दिल्ली को आजतक के कारण होने का जैसे एक कारोबारी दावा।

संगीत में मुखड़ा और भजन में टेक का विशेष महत्व है। ये गायक को पूरी दुनिया-जहां की बात करते हुए आख़िर में उसी मुखड़े-टेक पर लाकर स्थिर कर देता है। ऐसे जैसे सूरदास लिखते हैं- जैसे उड़ि जहाज़ को पंछी, फिरि जहाज पर आवै। कमाल ख़ान के लिए उनका कैमरामैन जहाज का पंछी हुआ करते जो आख़िर में इस अंदाज़ में उनकी ज़बानी आते कि हम दर्शक के भीतर ये इच्छा बनी रहती कि एक बार कैमरामैन के लिए इस रिपोर्ट को देखी जाय।

मौज़ूदा टेलिविज़न के दौर में जहां एंकरों/ चंद चमकीले चेहरे के आगे  न्यूज चैनलों का पूरा व्याकरण सिमटकर रह गया हो, कैमरामैन का काम अतिरिक्त खर्चे या भरती के तौर पर देखा जाने लगा हो (वज़ह यह भी सोशल मीडिया से मुफ़्त का माल और एडिटिंग मशीन की संतानें कमाल दिखा जाती हैं), कमाल ख़ान के साथ कैमरामैन नत्थी होकर ही स्क्रीन पर आते। हम उनकी उपस्थिति को उनके कैमरेमैन की उपस्थिति के साथ अनिवार्य ढंग से महसूस कर पाते।

आप जब रिपोर्टिंग के लिए फील्ड में जाएंगे और कैमरामैन के मिज़ाज को, उसके काम को ठीक-ठीक समझते हुए उन्हें बराबरी के साथ अपने साथ महसूस करेंगे तो वो आपके लिए ऐसा बहुत कुछ करने लग जाएंगे जो कई बार बेहद आत्मीय संबंधों में भी दुर्लभ है।

आपकी रिपोर्ट अच्छी बने, इसके लिए वो आपके साथ सम पर आने की कोशिश तो करेंगे ही लेकिन इसके साथ ही वो फील्ड में आपको वो भावनात्मक सुरक्षा का एहसास कराएंगे जिसके बाद आप ख़ुद को बहुत भरा-भरा और समृद्ध महसूस करेंगे। ख़ुद के भीतर दोहराएं- मेरा कैमरामैन मेरे साथ है। मुझे किस बात की चिंता है। इस बीच संभालकर पकड़ते हुए, कब चाय की प्याली, खाने की चीज़ें, आपके नाम खुलती टिफिन.. आपके सामने होंगे, आपको पता तक नहीं चलता। एक बेहतरीन रिपोर्टर अपने कैमरामैन के लिए सबसे प्यारा मनुष्य होता है।

एक बेहतरीन रिपोर्टर अपने कैमरामैन को अपनी पलकों पर बिठाकर रखता है। वो जानता है कि दुनिया चाहे भले ही हमारे नाम को गाती है लेकिन हमारी दुनिया हमारे कैमरामैन से है।

कमाल ख़ान की मौत की ख़बर के साथ मुझे सबसे पहले उनके साथ के कैमरामैन का ध्यान आया जिसका जिक़्र वो इस अंदाज़ में करते कि हम दर्शक टीवी स्क्रीन के सामने उनकी उपस्थिति महसूस कर पाते। कमाल ख़ान को हम उनके कैमरामैन के साथ ही याद करते रहेंगे। उनसे अलग वो कमाल के शख़्स रहे हैं लेकिन कमाल ख़ान तो अपने कैमरामैन का जिक़्र करते हुए ही। एक बेहद सधा हुआ, पेशेवर और आड़ी-तिरछी परिस्थितियों के बीच पत्रकारिता की तंग गलियों के बीच इसकी साख बचाने की कोशिश में लगे रहनेवाले कमाल ख़ान।

(ये लेख विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से लिया गया है। विनीत कुमार जाने माने मीडिया क्रिटिक हैं।)

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