कृष्णकांत

मोदी सरकार की हालत ये है कि अगर आप महज इसके झूठ गिनाने लगें ​तो आपको महसूस होगा कि आप एक अमर्यादित बहस का हिस्सा बन रहे हैं. ऐसा इसलिए है ​क्योंकि लोकतंत्र की संसदीय मर्यादा को सस्पेंड कर दिया गया है.

जैसे कि सरकार कह रही है कि वह किसानों के हित में कानून लाई है, लेकिन मूलत: ये कानून किसानों के खिलाफ पूंजीपतियों के फायदे का कानून है.

सरकार कह रही है कि वह कामगारों के हित में श्रम कानूनों में बदलाव करेगी. लेकिन जो प्रस्ताव हैं वे मालिकों के हित में हैं. मजदूरों से उनकी सामाजिक सुरक्षा, प्रदर्शन और हड़ताल का अधिकार वगैरह छीना जा रहा है. उन्हें फैक्ट्रियों से कभी भी निकाला जा सकता है.

सत्ता में आने के बाद से ही सरकार लगातार दोहराती रही कि भारत बहुत तेज गति से विकास कर रहा है. ये दोहराना उन्होंने तब बंद किया, जब अर्थव्यवस्था माइनस में चली गई.

सरकार कहती रही कि देश में नये अवसर पैदा हो रहे हैं. हालत ये हुई कि सिर्फ पिछले कार्यकाल में अनुमानत: 4 से 5 करोड़ नौकरियां चली गईं और भारत में बेरोजगारी बढ़कर 45 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई. कोरोना के बाद की तबाही इसकी तीन-चार गुनी है.

सरकार बार-बार दोहरा रही है कि रेलवे का निजीकरण नहीं होगा, लेकिन एक-एक स्टेशन रोज नीलाम हो रहा है.

सरकार ने आरटीआई को ‘मजबूत’ करने का संशोधन पास किया और सूचना आयोग को हाथी का दांत बना दिया.

सरकार ने कहा कि हम भ्रष्टाचार दूर करेंगे और प्रिवेंशन आफ करप्शन एक्ट को बदलकर कमजोर कर दिया.

प्रधानमंत्री का सबसे पहला और चर्चित वादा था कि ‘मैं देश नहीं बिकने दूंगा’. आज कौन सा सेक्टर है जिसे नीलामी पर नहीं चढ़ाया जा रहा है?

(यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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