Bihar
कृष्णकांत

इससे बर्बर समाज दूसरा नहीं हो सकता, जहां कोई भूख से दम तोड़ दे. लेकिन रोज दर्जनों लोग भूख के ब्लैक होल में समा रहे हैं.

एक मां रेलवे स्टेशन पर पड़ी है. दम निकल चुका है. उसका जरा सा बच्चा मां को जगाने की कोशिश कर रहा है. उस अबोध बच्चे को नहीं पता है कि मां चिरनिद्रा में चली गई. अब कभी नहीं जागेगी.

लेकिन हम आप तो जाग सकते हैं. जनता तो जाग सकती है. जो जिंदा बचे हैं वे जाग सकते हैं. वे जाग जाएं तो कम से कम यह पूछना शुरू कर दें कि जिस देश का अनाज भंडार हमने जरूरत से तीन गुना ज्यादा भर दिया है, वहां हमें ही भूख से क्यों मारा जा रहा है?

बच्चे की मां मर चुकी है. वह अब नहीं जाग सकती. लेकिन जनता की सोई हुई चेतना यकीनन जाग सकती है. मेरी औकात और हैसियत उतनी ही है जितनी उस बच्चे की है, लेकिन जनता की औकात उस मर चुकी मां से बहुत ज्यादा है. इतनी ज्यादा कि आगे से कोई मां भूख से स्टेशन पर दम न तोड़ दे.

हे जनता जनार्दन! आप जालिमों की गुलामी से बाहर क्यों नहीं आना चाहते?

 

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