लोकसभा में तमिलनाडु के डीएमके सांसद के. कामराज के एक सवाल का जवाब देते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि देशभर में सरकार द्वारा संचालित मेडिकल/डेंटल कॉलेज में 30,455 एमबीबीएस व 2930 सीट डेंटल की है व निजी कॉलेजों में 36,165 सीट एमबीबीएस की व 24,130 बीडीएस अर्थात डेंटल की सीट उपलब्ध है।

मैंने निजी कॉलेजों के एमबीबीएस व बीडीएस कोर्स की फीस व उसमे एडमिशन लेने वाले मेरिटधारियों की रैंक व नंबर के बारे में जानकारी खोजनी शुरू की जिसमे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए है।

2017 में 5% फिजिक्स, 10% केमिस्ट्री व 20% से कम बायोलॉजी में नीट में अंक हासिल करने वाले लड़कों को निजी कॉलेजों में एमबीबीएस में दाखिला मिल गया। यह कैसे संभव हुआ!

2016 से पहले नीट क्वालीफाई करने के लिए 50% मार्क्स जनरल केटेगरी व 40% मार्क्स आरक्षित वर्ग के लिए निश्चित थे लेकिन उसके बाद सरकार ने बैकडोर से परसेंटाइल सिस्टम लागू कर दिया। परसेंटेज व परसेंटाइल सिस्टम के भेद को ठीक से समझ लीजिए।

50% का मतलब था कि आपको 720 में से 360 अंक लाने अनिवार्य है जबकि 50 परसेंटाइल का मतलब है कि परीक्षा देने वाले कुल छात्रों में से आधे यानी 50% छात्रों की रैंक आपसे कम है।

2016 में 50 परसेंटाइल प्राप्त करने वाले स्टूडेंट के कुल नंबर थे 145 मतलब 720 का प्रतिशत निकाले तो 20%मार्क्स।

20% मार्क्स वाले ने निजी कॉलेज में एमबीबीस में एडमिशन ले लिया। पहले वाली व्यवस्था में हर विषय मे 50%व 40% अंक हासिल करने होते थे व नये नियम के मुताबिक कुल परसेंटाइल 50 व 40 कर दिए।

यानी फिजिक्स में 5नंबर, केमिस्ट्री में 10 नंबर व बायोलॉजी में 130 नंबर आ गए तो एडमिशन पक्का हो गया बस आपके बाप के पास प्रतिवर्ष 17 लाख रुपये कॉलेज की फीस भरने के लिए होना चाहिए व होस्टल, मेस, लाइब्रेरी की अतिरिक्त फीस भरने का दम होना चाहिए।

इस व्यवस्था के लागू होने के कारण पिछले साल 720 में से 549 अंक हासिल करने वाला गरीब का बेटा एडमिशन से वंचित हो गया और 720 में से 145 अंक हासिल करने वाले अमीर बाप के बेटे को दाखिला मिल गया।

लगभग एक करोड़ रुपये खर्च करके एक नाकाबिल बेटे को जो बाप डॉक्टर बनाएगा वो क्या बेटे को बोलेगा कि मानवीय पेशे के सेवाभाव के कर्तव्य पर चलो!

जो गरीबों/वंचितों/दबे-कुचले लोगों को मिले संवैधानिक आरक्षण पर छाती पीट पीटकर चिल्लाते है कि आरक्षण से गधे गुलाबजामुन खा रहे है और घोड़े घास से वंचित है वो लोग बता सकते है कि यह कौनसा आरक्षण है और इसका फायदा कौन लोग उठा रहे है?

इस साल भी इसी व्यवस्था से दाखिले हो रहे है।क्या जाति आधारित आरक्षण को गालियां देकर आर्थिक आधार पर आरक्षण मांगने वाले मेरिटधारी एक करोड़ रुपये खर्च करके डॉक्टर बन पाएंगे!

असल में हमने सामाजिक न्याय की जंग ईमानदारी से लड़ी ही नहीं। हमे सामाजिक न्याय से कोई मतलब नहीं रहा और ऊपर से पूंजीवादी व्यवस्था थोप दी गई।

जातीय श्रेष्ठता के गुरुर से बाहर निकलने की हिम्मत हमारे अंदर नहीं है और पूंजीवादी मार को सहन नहीं कर पा रहे है इसलिए विरोधाभास में फंसकर एक दूसरे को आपस मे गालियां दे रहे है! इसलिए मैँ कहता हूँ कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में एकदूसरे का सहयोग करते हुए इन पूंजीवादी लुटेरों के खिलाफ खड़े हो जाओ।

लड़ाई लुटेरा बनाम कमेरा है। सभी मेहनतकशों को एकजुट होना होगा। मैंने तो सिर्फ एक मेडिकल दाखिले की बात बताई है।

यही हाल सिर्फ IIT व IIM जैसे संस्थानों में ही नहीं है बल्कि हर शैक्षणिक संस्थान पर इसी तरह कब्जा जमाया जा रहा है और गरीबों के बच्चों का भविष्य रौंदकर मजदूर बने रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

(यह लेख निशिकांत यादव की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

one × 3 =