तारिक़ अनवर चम्पारणी

लालू-राबड़ी परिवार एक बार पुनः चर्चा के केंद्र में है। चर्चा का कारण अभी हाल ही में रिलीज हुई हुमा कुरैशी अभिनीत वेबसीरीज़ “महारानी” है। दर्शकों का ऐसा मानना है कि इस पूरी सीरीज़ को लालू-राबड़ी परिवार को केंद्र में रखकर फिल्माया गया है।

बल्कि इस सीरीज की कहानी, कैरेक्टर और नब्बे की दशक की राजनीतिक घटनाक्रमों को एक-दूसरे से जोड़ने पर बिहार का बच्चा-बच्चा भी बहुत आसानी से यह बात समझ सकता है।

फ़िल्म को समाज का आईना समझा जाता है। लेकिन अनेकों बार इसका आईना से ज़्यादा प्रोपेगंडा के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। मैं पहली बार एक ऐसी वेबसेरीज़ देख रहा हूँ जिसमें एक राजनीतिक हस्ती के कुछ सकारात्मक पहलुओं को दिखाकर भी उस हस्ती की चरित्रहनन करने की भरपूर कोशिश की गयी है।

पूरी सीरीज में एक तरफ राबड़ी जी को एक मासूम महिला की तरह पेश किया गया है। लेकिन दूसरी तरफ़ बार-बार अनपढ़ बताकर आज के जनमानस में यह विचार स्थापित करने की पूरी कोशिश की गयी है कि वह एक अयोग्य मुख्यमंत्री थी और उनके पति लालू प्रसाद यादव एक भ्रष्ट राजनेता है।

भारतीय दर्शकों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बहुत सेलेक्टिव एवं पूर्वाग्रह से ग्रसित होते है। किसी घटना या फ़िल्म या सिनेमा को उनके देखने का नज़रिया भी उनकी जाति, धर्म, समुदाय, समाज, लिंग, नस्ल एवं राजनीतिक विचारधाराओं से बंधा होता है। लेकिन राजनीतिक घटनाक्रमों का आपस मे कुछ इसतरह का जुड़ाव होता है कि पटकथा लेखक एवं निर्देशक सच्चाई को छुपा भी नहीं पाते है।

राजनीति पर आधारित सिनेमा को समझने के लिए इतिहास का सहारा लेना आवश्यक होता है। किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम को उस कालखंड में जाकर समझना पड़ता है जिस कालखंड में घटना घटित हुई है।

इसलिए “महारानी” वेबसेरीज़ को भी कई नज़रिया से समझने की आवश्यकता है। एक नज़रिया वह है जिसे एक सीधा-साधा व्यक्ति समझ रहा। लेकिन एक दूसरा नज़रिया भी है जिसे मैंने इस वेबसेरीज़ को समझने की कोशिश करी है।

सीरीज में पशुपालन विभाग के 958 करोड़ के घोटाला को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। इससे यह साबित होता है कि लालू प्रसाद यादव की एक नकारात्मक छवि गढ़ने की कोशिश की गयी है। यह स्थापित करने की कोशिश की गयी है कि राबड़ी देवी भले मासूम है मगर लालू यादव भ्रष्टाचारी है।

लेकिन इसी सीरीज के एक कैरेक्टर वित्त सचिव परवेज़ अहमद की जाँच से यह साबित हो रहा है कि यह घोटाला एक दिन का नहीं है बल्कि पूर्व की सरकारों से चली आरही है। जब इस घटना को वास्तविक राजनीतिक घटनाक्रमों से जोड़कर देखते है तब राबड़ी देवी विधानपरिषद में कई बार इस मुद्दा को उठाती आयी है और पूर्व की सरकारों पर भी जाँच बैठाने की बात करती रही है।

हालाँकि पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा भी इसमें आरोपी थे। इस सीरीज से ही यह बात भी साबित होती है कि इस घोटाला की जाँच के आदेश भी लालू-राबड़ी सरकार ने ही दी थी। लेकिन केवल राजनीतिक द्वेष के कारण इस पूरे घोटाला के केंद्र में केवल लालू-राबड़ी परिवार को रखने का प्रयास हुआ।

वेबसेरीज़ में दिखाया गया है कि लालू यादव और राबड़ी देवी के समय में जातीय गिरोहों को बल मिलना शुरू हुआ और दर्जनों जातीय नरसंहार हुए। यह सच्चाई का केवल एक पक्ष है। लेकिन इसी सीरीज़ से यह बात भी साबित होती है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने केवल व्यवहारिक राजनीति पर चोट नहीं किया बल्कि व्यवस्था पर भी चोट किया।

जिस सामंत के सामने पिछड़े, दलितों एवं गरीबों की जोरू(महिलायें) और ज़मीन दोनों गिरवी होती थी उस सामंतवाद पर उन्होंने सीधा प्रहार किया। सीरीज से यह बात साबित होती है कि एक व्यवस्था जो सदियों से चला आरहा है जब उसपर प्रहार किया गया तब उस व्यवस्था के पूजक या वाहक यथास्थिति(Status Quo) को बनाये रखने के लिए जातीय बैनर तले हथियार उठाया जिसके फलस्वरूप दर्जनों नरसंहार हुए। सीरीज में जिस वीर सेना को फिल्माया गया है दरअसल वह सवर्ण जमींदारों एवं सामंतों का मिलिटेंट ग्रुप रणवीर सेना है जिसकी गोलियों की तड़तड़ाहट से मध्य एवं दक्षिण बिहार के दर्जनों दलित बस्ती के सैकड़ों परिवार के खून से जमीन लाल हो गयी।

रणवीर सेना वजूद में उसी समय आया जब लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने के बाद दलितों, पिछड़ों एवं दबे-कुचले मुसलमानों का मुँह खुलना शुरू हुआ। लालू यादव के कार्यकाल में दबे-कुचले लोगों को “स्वर” मिलना एक सामाजिक बदलाव था जिसे रोकने के लिए नरसंहार जैसा खूनी खेल खेला गया।

इस वेबसीरीज़ में लगातार लालू यादव और राबड़ी देवी के गाय प्रेम को दर्शाया गया है। यह दिखाने की कोशिश की गयी है कि लालू-राबड़ी को राज्य की जनता से अधिक गाय से प्रेम था इसलिए मुख्यमंत्री आवास एक-अणे मार्ग को गऊशाला बना दिया गया था। यह एक ऐसा मुद्दा था जिसपर विपक्षी दलों और उनके कार्यकर्ताओं अर्थात वर्तमान के तथाकथित राष्ट्रवादियों ने सबसे अधिक मज़ाक बनाया है।

लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। हिन्दू धर्म के मतावलंबी गाय को माता का दर्जा देते है। आज गौरक्षा के नाम पर गौरक्षक खुलेआम सड़कों पर अल्पसंख्यक, दलित एवं आदिवासी समाज के लोगों की हत्या कर रहे है। आज की वर्तमान सरकार गौरक्षा के लिए सैकड़ों करोड़ की बजट जारी कर रही है। फ़िर ऐसे में लालू यादव और राबड़ी देवी का गाय प्रेम हास्य का पात्र कैसे हो सकता है?

जब्कि वह स्वयं को कृष्णवंशी या ग्वाला समाज का बताते है। जिनका पुश्तैनी पेशा ही दूध और गौपालन है। लेकिन मुझें इसबात का संतोष है कि इनके कार्यकाल में गाय प्रेम के नाम पर गौरक्षकों की तरह आतंक नहीं फैलाया गया।

इस सीरीज में रानी देवी (हुमा कुरैशी) के मुख्यमंत्री बनने के बाद विपक्ष के लोग मुख्यमंत्री पर अनपढ़, गँवार, अयोग्य और अनुभवहीन होने का आरोप लगाते है। जिसके बाद मुख्यमंत्री रानी देवी बड़ी सहजता एवं सौम्यता के साथ सारे आरोपों का जवाब देती है। रानी देवी के जवाब को सुनकर 28 नवंबर 2020 की एक घटना याद आता है।

बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी जब विधानपरिषद में भाषण देने के लिए खड़ी हुई तब किसी विपक्षी सदस्य ने “अनपढ़” बोलकर उनका मज़ाक उड़ाया था। उसके बाद राबड़ी जी ने बड़ी सरलता के साथ जवाब दिया। वह बोली “हम पाँचवी कक्षा तक पढ़ें है। क्योंकि गाँव में पाँचवी कक्षा तक ही स्कूल थी। हमारे अनपढ़ रहने में हमारा कोई दोष नहीं है। यह उस समय की व्यवस्था का दोष है।”

राबड़ी जी का यह कथन महज एक राजनीतिक ब्यान नहीं है बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक तथ्य एवं इतिहास छुपा हुआ है। राबड़ी जी के इस ब्यान का एक सामाजिक दृष्टिकोण है। आज़ादी के बाद जब शिक्षा-व्यवस्था का विस्तार हुआ तब गाँव-गाँव में विद्यालय खोले गये।

इन विद्यालयों को खोलने के लिए इन सामंती एवं जमींदार लोगों ने ही जमीन दान किया था। ऐसे में विद्यालय पर प्रभाव भी सामंती लोगों का होता था। इसलिए दलित और पिछड़ों की महिलाएं शिक्षा ग्रहण से दूर रह जाती थी।

महिलाओं की अशिक्षा का मामला केवल दलित एवं पिछड़ी जाति की महिलाओं तक सीमित नहीं था बल्कि नब्बे के दशक में सवर्ण जातियों की महिलायें भी अपने चौखट से बाहर नहीं जाती थी और शिक्षा का दर उनके यहाँ भी संतोषजनक नहीं था।

सीरीज में बार-बार यह दिखाया जाता है कि यदि रानी देवी पूर्व मुख्यमंत्री (भीमा सिंह भारती) की पत्नी नहीं होती तब गोपालगंज के किसी गाँव मे गाय और भैंस को चारा डालती होती। वास्तविक जीवन में भी राबड़ी देवी को लालू प्रसाद यादव की पत्नी होने के नाते इस तरह के कटाक्षों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इसका एक पक्ष और भी है।

राबड़ी देवी से पूर्व और बाद भी बिहार में सैकड़ों महिला विधायक और सांसद निर्वाचित हुई लेकिन वह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक क्यों नहीं पहुँच सकी? चलिये मान लेते है कि लालू प्रसाद यादव की पत्नि राबड़ी देवी एक गंवार महिला है।

लेकिन बिहार के पूर्व के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों की पत्नियाँ तो गंवार नहीं थी। फिर किसी ने भी अपनी जगह उनको मुख्यमंत्री बनाने का साहस क्यों नहीं किया? आज़ादी के 75 वर्ष पूरे होने को है और क्यों आजतक बिहार में राबड़ी देवी से पहले या बाद में कोई दूसरी महिला मुख्यमंत्री नहीं बन सकी?

लालू यादव की पत्नि होना एक एडवांटेज अवश्य है लेकिन बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर समाज की रूढ़िवादी सोच को राबड़ी देवी ने चैलेंज करने की एक कोशिश जरूर करी थी। लालू यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर अपनी सामाजिक न्याय की लड़ाई में महिला नेतृत्व को आगे करके इस पितृसत्तात्मक समाज पर चोट करने का एक प्रयास अवश्य किया था।

लेकिन आज भी हमारा समाज महिला विरोधी है। नारीवाद का विमर्श भी केवल सवर्ण महिलाओं के इर्दगिर्द घूमता है। जैसे ही इस विमर्श के केंद्र में कोई राबड़ी देवी या मायावती आती है तब विमर्श बदल जाता।

यह जातिवाद का ही प्रभाव है कि मायावती जैसी शिक्षित महिला को तानाशाह तो राबड़ी देवी जैसी घरेलू महिला को गँवार एवं अनपढ़ का लेबल लगाकर समाज के सामने हीन साबित करने की कोशिश की जाती है। महारानी वेबसेरीज़ में भी राबड़ी देवी की कुछ सकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करके बड़ी चालाकी से नवयुवकों के बीच पूरे परिवार की नकारात्मक छवि गढ़ने की कोशिश हुई है।

● तारिक़ अनवर चम्पारणी
(लेखक- जामिया मिल्लिया इस्लामिया और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुम्बई के छात्र रहे है और वर्तमान में महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय बिहार में रिसर्च स्कॉलर है)

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