लीक हुई चैट बताती है कि पुलवामा में 40 जवानों की शहादत से अर्नब गोस्वामी खुश थे. उनका कहना था कि “This attack we have won like crazy”.

40 जवानों की शहादत पर ये क्रैजी होकर उत्सव मना रहे थे. ये वही गोस्वामी हैं जो राष्ट्रभक्ति और देशद्रोह का प्रमाणपत्र बांटते फिरते हैं.

बालाकोट स्ट्राइक की उन्हें पहले से जानकारी थी कि कुछ बड़ा होने वाला है, ऐसा कि लोग प्रफुल्लित हो जाएंगे. बालाकोट पर वे कहते हैं, “it’s good for the big man he will win the elections”.

वे मोदी के लिए खुश थे कि वे चुनाव जीतेंगे. वे अपने लिए खुश थे कि उनकी टीआरपी बढ़ गई. वे दुखी नहीं थे. वे टीआरपी और चुनावी बढ़त का जश्न मना रहे थे.

पुलवामा हमले में देश के 40 जवान शहीद हुए थे. 40 परिवार बेसहारा हुए थे. जवानों के पोस्टर लगाकर चुनाव में वोट मांगे गए थे. उस समय जिन्होंने सवाल उठाया था, उन्होंने गाली खायी थी. जवानों के काफिले में आरडीएक्स के भरी गाड़ी कैसे पहुंची, इसकी आजतक जांच नहीं हुई.

हमले की जांच क्यों नहीं हुई? अर्नब गोस्वामी को बालाकोट ऑपरेशन के बारे में पहले से कैसे पता था? क्या उन्हें पुलवामा के बारे में भी पता था? क्या पुलवामा एक सोची समझी चुनावी चाल थी?

पुलवामा हमले की कहानियों में झोल था. लेकिन उस समय सवाल उठाने वालों ने सिर्फ गाली खाई. This attack we have won like crazy कहने वालों की चीख सवालों पर भारी पड़ी.

किसी राष्ट्रवादी ने ये सवाल कभी क्यों नहीं उठाया कि 40 जवानों के साथ न्याय होना चाहिए, इस हमले के दोषी खोज जाने चाहिए, उन्हें दंड मिलना चाहिए?

वे अपने को राष्ट्रवादी कहते हैं और सैनिकों की शहादत का उत्सव मनाते हैं. ध्यान रहे, अगर बलिदान जैसी कोई चीज है तो शहादत इस दुनिया का सर्वोच्च बलिदान है.

मनुष्य प्राण देने से बड़ा बलिदान नहीं दे सकता. ये घिनौने राष्ट्रवादी शहादतों का चुनावी इस्तेमाल करते हैं. ये मौतों पर टीआरपी बढ़ाकर नाचते हैं.

उम्मीद है कि इस घिनौने और क्रूरतापूर्ण राष्ट्रवाद को जनता देर-सवेर समझेगी.

( यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है )

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