मंदसौर के किसान आंदोलन के समय टीवी चैनलों पर आंदोलन के सूत्रधार और प्रणेता के रूप में एक शातिर संघी प्रकट होने लगा था। नाम था- शिवकुमार शर्मा।

सिंघु बॉर्डर और देश के अन्य जगहों पर चल रहे कृषि कानून विरोधी आंदोलन का भी फायदा उठाने में आरएसएस का ये एजेंट जुट गया है। अन्ना आंदोलन की तरह फायदा उठाने के चक्कर में उसने अपना उपनाम कक्का चला दिया।

कई टीवी चैनलों ने इस फर्जी किसान नेता के दिल्ली पहुंचने की खबरें भी अन्ना की शैली में चलाईं- कक्का दिल्ली रवाना, कक्का फरीदाबाद पहुंचे, कक्का दिल्ली पहुंचे।

असल में मंदसौर में 1 जून 2017 से शुरू हुए किसान आंदोलन में 7 दिन तक शिवकुमार शर्मा का नाम कहीं नहीं दिखा था।

मामला तूल पकड़ गया, 9 किसानों के मरने की पुष्टि हो गई तो भाजपा-संघ ने अपने पुराने संघी और कथित किसान नेता शिवकुमार शर्मा को झाड़-पोंछकर पूरे आंदोलन का अगुवा बनाकर पेश कर दिया था। अखबारों और न्यू़ज़पोर्टलों पर शिवकुमार शर्मा किसानों के नायक बनाकर पेश किए जाने लगा।

जनसत्ता, एबीपी न्यूज़, बीबीसी, और तमाम बडे़ मीडिया में एक साथ एक ही दिन शिवकुमार शर्मा छा गया था।

शिवकुमार शर्मा को इसलिए चढ़ाया जा रहा था कि किसानों का आक्रोश किसी गैर भाजपा दल का समर्थन न कर दे, बाकी शर्मा को तो पुराने संबंधों का वास्ता देकर कभी भी साथ में ले लिया जाएगा।

शर्मा म.प्र. सरकार में विधि सलाहकार रहा है। पत्नी मंजुला शर्मा सरकारी कॉलेज की प्रिंसिपल है। दो बेटियों में से एक निहारिका स्पोर्ट्स टीचर है, और दूसरी अवंतिका दिल्ली में इंजीनियर है। खेती और किसानों से शर्मा के परिवार का कोई लेना-देना नहीं रहा है, जैसे कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के शीर्ष नेताओं में से कोई भी विद्यार्थी नहीं होता।

शिवकुमार शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भारतीय किसान संघ का म.प्र. में अध्यक्ष रहा। किसान संघ आरएसएस के निर्देश पर अन्य अनुषंगी संगठनों की तरह कभी-कभी भाजपा सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन करता रहता है और उन सरकारों के लिए सेफ्टी-वॉल्व का काम करता है।

इसी क्रम में मई 2012 में भी म.प्र. के बरेली शहर में किसान आंदोलन भारतीय किसान संघ ने कराया था लेकिन उस पर शिवकुमार शर्मा नियंत्रण नहीं रख पाया था।

आंदोलन भड़क गया तो पुलिस ने फायरिंग की थी और कुछ किसानों की मौत हुई थी। उस समय शिवराज का जलवा था तो उनकी जिद पर शर्मा को संघ से निकाल दिया गया था। शर्मा को जेल भी जाना पड़ गया था।

मंदसौर किसान आंदोलन के समय भाजपा को शिवकुमार शर्मा की फिर से ज़रूरत पड़ गई थी। किसान नेता के रूप में अपना ही आदमी प्रोजेक्ट हो इससे बढ़िया क्या हो सकता था।

यह सब बताना इसलिए भी जरूरी हो गया है कि यही फर्जी किसान नेता शिवकुमार शर्मा मौजूदा आंदोलन में शामिल होकर किसानों में फूट डालने में लगा है।

पहली कोशिश इसने किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी को संयुक्त किसान मोर्चा से बाहर करने के लिए की और उन पर कांग्रेस से 10 करोड़ रुपए लेने का आरोप लगाया। बाद में इसे आरोप वापस लेना पड़ा और माफी मांगनी पड़ी।

असल में इसकी इस आंदोलन में भूमिका केवल इसलिए दिखती है क्योंकि हर घटनाक्रम पर टीवी चैनलों पर ये दिखने लगता है।

किसान आंदोलन से इसको जल्द से जल्द निकाल बाहर न किया गया तो बड़ा नुक़सान भी हो सकता है।

( यह लेख पत्रकार महेंद्र यादव की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है )

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