सुप्रीम कोर्ट में मध्यस्थता के लिए एक भी याचिका नहीं थी. किसानों ने मध्यस्थता की मांग नहीं की थी. कोर्ट में किसानों की तरफ से वकील ने सबसे पहले यही मांग रखी कि ये कानून रद्द किए जाएं.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक बिन मांगी कमेटी पकड़ा दी जैसे मोदी सरकार ने बिना मांगे कानून थमा दिया था. जो कमेटी ​गठित हुई है, उसमें भी चार में से तीन ऐसे लोग शामिल हैं

जो पहले ही इन कानूनों का समर्थन कर चुके हैं. जो पहले से इस कानून के समर्थन में हैं, जाहिर है कि वे किसानों की मांग के विरोध में हैं और सरकार के पक्ष में सिफारिश देंगे.

दूसरा अहम निर्णय है कि कोर्ट ने कानूनों पर स्टे किया है. इसके पहले सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर भी स्टे हुआ था. एक महीना भी नहीं बीता, स्टे हट गया.

कल को कोर्ट सरकार की दलीलें सुनने के बाद स्टे हटा लेगा और नजीता वही ढाक के तीन पात. कमेटी में ऐसे विशेषज्ञों को नहीं रखा गया जो किसानों के हित की बात करते रहे हैं.

इन्हीं विसंगतियों को देखते हुए किसानों ने साफ कह दिया है कि हम सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं, लेकिन इस कमेटी से हमारा कोई लेना देना नहीं है. ये जनता और चुनी हुई सरकार के बीच का मसला है.

मांग स्पष्ट है कि ये कानून रद्द होने चाहिए. सुप्रीम कोर्ट चाहे तो कमेटी बनाए, ये उसकी मर्जी है, लेकिन हमने न इस कमेटी की मांग की थी, न हमें इससे कोई लेना देना है.

फिलहाल ये पूरी कवायद कमेटी और कमीशन के जरिये उलझाने और किसान आंदोलन को खत्म करने का प्रयास ज्यादा लग रही है.

( यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है )

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