कृष्णकांत

ये चुनाव मोदी बनाम ममता लड़ा गया था, लेकिन ये हार नरेंद्र मोदी की नहीं है. ये हार देश की है. जनता हार गई है. हम सब हार गए हैं. हममें में तमाम लोग अपनी जिंदगियां हार गए हैं.

सामान्य लोग, जिनके पास कोई खास अधिकार नहीं हैं, वे दिन भर लोगों की मदद करने की कोशिश करते हैं और मदद न पहुंचा पाने पर दुखी होते हैं. वे रोते हैं. अस्पतालों में डॉक्टर निराश हैं.

वे आक्सीजन बिना मरते मरीज को देखकर रो रहे हैं. दिल्ली के मैक्स अस्पताल में गोरखपुर के डॉ विवेक राय ने कल खुदकुशी कर ली. सिर्फ अप्रैल महीने में लगभग 50 हजार लोग मारे गए हैं.

चुनाव कौन जीता, यह बेकार है. हमारा भारत हार गया है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी राजधानी में भी मरीजों को आक्सीजन देने में नाकाम है.

देश भर की सड़कों पर लोग तड़प तड़पकर मरते रहे और चुनाव प्रचार चलता रहा. उन्हें सांस मुहैया कराने की जगह आप वोट मांगते रहे.

अंत समय तक प्रचार नहीं रोका गया. अब भी लोग मर रहे हैं और जरूरी चीजों की सप्लाई सुनिश्चित नहीं हो पाई है.

इसी जनता ने आपको सबसे बड़ी कुर्सी दूसरी बार सौंपी है. उस कुर्सी पर बैठकर सवा दो लाख मौतों की जवाबदेही कबूल करने की हिम्मत है? नहीं है. यही देश का कथित ‘मजबूत नेतृत्व’ है.

लोगों को बचाने की भरपूर कोशिश होती, फिर भी लोग मरते तो वह दुख के साथ स्वीकार कर लिया जाता कि प्राकृतिक आपदा में लोग मारे गए. लेकिन यहां लोग आक्सीजन और दवाओं के अभाव में मरे. बेड न मिलने से मरे. अस्पताल और डॉक्टर न मिलने से मरे.

मैं माफी के साथ कहना हूं कि ये मौतें नहीं हैं, ये आजाद भारत का सबसे बड़ा नरसंहार है.

(यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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