किसानों के ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा पर सोशल मीडिया पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कोई किसान नेताओं को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई सरकार से सवाल कर रहा है।

मत विमत की इस कड़ी में पेश है पत्रकार श्याम मेरा सिंह का ये लेख जो उन्होंने फ़ेसबुक पर लिखा है-

आज आपको सड़कों पर खड़ी बसों के साथ होती तोड़फोड़ नजर आ रही होगी लेकिन सड़कों पर गड्डे खोद देना, सड़कों पर कंक्रीट भरे ट्रक लगा देना, सड़कों पर पत्थरों की बेरिकेडिंग लगाने का काम भी तो खुद सरकार ने पिछले 2 महीने से किया हुआ है.

पूरी दुनिया में कोई कितनी भी अहिंसक भीड़ क्यों न हो, दो महीने शीत लहरी में ठिठुर लेने के बाद, महीने भर सर्दी में बारिश सहने के बाद, 140 किसानों की मौत के बाद, ऊपर से लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों के बाद एक लंबे समय तक अहिंसक बनी नहीं रह सकती.

एक तरफ से दो महीने भर हिंसा की जाती रहे और बदले में भीड़ अहिंसक बनी रहे ऐसा संभव ही नहीं है. हिंसा का समर्थन तो वे लोग कर रहे हैं जो सरकार द्वारा दो महीने तक ढहाए जुल्म का समर्थन कर रहे हैं.

अगर वो जुल्म न होता तो आज आम नागरिकों को ये दिन न देखना पड़ता. भीड़ का विज्ञान भी क्या सरकार की समझ में नहीं आता? आप किसी भीड़ को जितना अधिक दिन दबाएंगे वह उतनी ही तेजी से प्रतिकार करेगी.

अगर आज किसानों का एक समूह बेकाबू है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्यों सरकार ने ये मसला समय रहते हल नहीं किया? क्या उसका कानून इतना अधिक पवित्र और नेक था कि उसे छुआ नहीं जा सकता था.

प्रदर्शन करने आए 34-35 साल के नवदीप को गोली मारकर उड़ा दिया गया. 140 से अधिक किसानों की मौत हो गई. कितने के हाथ टूटे, कितनों के पैर तोड़ दिए गए इनका तो कोई हिसाब ही नहीं है.

सरकार ने नवंबर महीने से ही कंक्रीट भरे ट्रक और टैंकर लगा दिए. 11 से अधिक बैठकें कीं लेकिन सरकार अपने बनाए इकतरफा क़ानून पर पर हठ करती रही जबकि संसद में भी उस कानून पर कभी कोई बहस नहीं की गई. कोरोना में ही मौका देखते पास कर दिया गया.

किसानों पर पहले ही दिन से आसूं गैस और लाठीचार्ज किए गए. आज भी जब किसान प्रदर्शन करना चाहते थे तो निहत्थे किसानों पर लाठियां बरसाई गईं. हिंसक कौन है?

सरकार या किसान? नवंबर से चले किसान आन्दोलन को दिल्ली में ही जनवरी बीत लिया, क्या कर रही थी सरकार? क्या उसका कानून, उसकी लाठी, उसके ट्रक, दिल्ली की शीतलहरें, लाठीचार्ज, आसूं गोले सब अहिंसक थे?

अगर आज दिल्ली की सड़कों पर अराजकता फ़ैली है तो उसके जिम्मेदार किसान नेता नहीं बल्कि हठी और अभिमानी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हैं. और अगर आगे दिल्ली की सड़कों पर इससे भी अधिक हालत खराब होते हैं तो इसके जिम्मेदार कोई और नहीं ये हठी सरकार होगी.

सरकार को तुरंत इस मसले पर गंभीरता विचार करना चाहिए और बेकाबू होते इस प्रदर्शन को रुकवाना चाहिए. आपकी अकेली इकतरफा तानाशाही, आपका इकतरफा हठ लंबे समय तक नहीं चलेगा.

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