ये नीरज चोपड़ा के पिता सतीश चोपड़ा हैं. वे किसान हैं. आज इनके बेटे ने टोक्यो ओलंपिक में तिरंगा लहराकर देश का मान बढ़ाया है. हर हिंदुस्तानी खुशी से झूम रहा है.

नीरज चोपड़ा की तरह ओलंपिक में पहुंचे तमाम खिलाड़ी ऐसे ही किसान और मजदूर और बेहद सामान्य परिवारों से हैं.

अब तक भारत को 7 मेडल मिल चुके हैं. हर ​मेडल को सेलिब्रेट किया जाता है. हर मेडल लाने वाले खिलाड़ी के परिवार के संघर्ष की कहानियां छापी जा रही हैं. हर विजेता के लिए हो रहे सेलिब्रेशन पर मुझे सड़कों पर उतरे लाखों किसान याद आते हैं.

अगर यही नीरज चोपड़ा अपने पिता के साथ जंतर मंतर पहुंच जाएं तो क्या इन्हें ऐसा ही सम्मान मिलेगा? दिल्ली के बॉर्डर पर पहुंचे ऐसे ही लाखों किसानों के साथ हमने क्या सुलूक किया है? कई सौ किसान ठंड में प्रदर्शन करते हुए मारे गए.

हमारी राजधानी की सीमाओं पर 8 महीने से हजारों किसान प्रदर्शन कर रहे हैं. यूपी, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब समेत देश भर के किसान सरकार के सामने कुछ मांगें रखना चाहते हैं.

वे कहना चाहते हैं कि हमारी खेती, हमारी जमीन, हमारा रोजगार मत छीनो. हमें और हमारी खेती को कॉरपोरेट की जेब में मत डालो. हमें सुरक्षा दो ताकि हम देश का पेट भरने के साथ खुद भी जीवित रहे सकें. क्या ये मांगें नाजायज हैं!

उनकी बात सुनी तो नहीं गई, उल्टा उन्हें खालिस्तानी, पाकिस्तानी, चीनी, वामी, देशद्रोही, मवाली, गुंडा, डिजाइनर किसान, फर्जी किसान और न जाने क्या क्या कहा गया.

हो सकता है कि किसान संगठनों के नेता धनवान हों, लेकिन उनके साथ जो किसान सड़कों पर बैठे हैं, वे तो आम किसान हैं! लेकिन आठ महीने में उनके साथ दुश्मनों जैसा सुलूक किया गया और अब भी किया जा रहा है.

कुछ दिनों पहले सिंघू बॉर्डर पर एक आर्मी जवान तख्ती लेकर आया था. उस पर लिखा था कि यदि मेरा बाप आतंकवादी है तो मैं भी आतंकवादी हूं. इसका मतलब आप समझते हैं?

देश की रक्षा में सीमा पर खड़े जवान के पिता को आतंकवादी बताकर यह देश उस जवान के बलिदान को अपमानित करता है. प्रदर्शन में आए उस जवान के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई बैठाई गई थी.

जिन लोगों से फायदा हो रहा हो उन्हें सिर पर बैठा लिया जाता है, लेकिन वही जनता पलटकर सवाल पूछ ले, अपना हक मांग ले तो उसे देशद्रोही कह दिया जाता है.

आज देश की जनता को सिखाया जा रहा है कि मुट्ठी भर लोगों के समूह को जो प्रिय लगे, उसी से प्रेम करो. वे चंद लोग जिससे घृणा करें, उससे तुम भी घृणा करो. आम जनता इतनी गहरी साजिश नहीं समझ पाती. वह इसका शिकार हो जाती है.

नीरज चोपड़ा भी आर्मी में सूबेदार हैं. सोचिए, अगर यही ​नीरज चोपड़ा कल किसानों के समर्थन में, अपने पिता के व्यवसाय के समर्थन में सड़क पर आ जाएं तो क्या होगा?

क्या हम आप तब भी नीरज चोपड़ा का ऐसा ही साथ देंगे? अगर हम मेडल विजेता नीरज चोपड़ाओं के साथ हैं तो उनके पिताओं को सड़कों पर लाठी क्यों मारते हैं?

खैर, आज नीरज चोपड़ा ने इतिहास रचा है, इसके लिए उन्हें सलाम!

(यह लेख पत्रकार कृष्णकांत की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है)

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