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पूरी दुनिया में जब इस बात चर्चा हो रही है कि युद्ध क्यों नहीं होना चाहिए, तब भारतीय मीडिया इस बात पर चर्चा कर रहा है कि युद्ध क्यों होना चाहिए।

पुलवामा हमले के बाद से ही सीमा पर तनाव था। इसके बाद दोनों देशों की तरफ से लाइन ऑफ कंट्रोल के उल्लंघन ने स्थिति को और नाजुक बना दिया था। युद्ध जैसा माहौल हो चला था। लेकिन दोनों मुल्कों के अमन पंसद लोग लागतार युद्ध के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे थे।

वहीं दूसरी तरफ इस अति-संवेदनशील महौल में गोदी मीडिया स्टूडियो से युद्ध का ऐलान कर रही थी। न्यूज चैनलों में वॉर रूम बने चुके थे। बड़े बड़े मूछों वाले रक्षा विशेषक्ष मुंह से आग निकालने लगे थे।

गोदी मीडिया के पत्रकार घूसकर मारने, चढ़कर मारने, तबाह करने की बात तो ऐसे कर रहे थे मानो वही सीमा पर खड़े हो। सत्ता की गोदी बैठी ये मीडिया दर्शकों को युद्ध के दुष्परिणाम नहीं बता रही है क्योंकि इससे सत्ताधारी दल को राजनीतिक फायदा नहीं मिलेगे।

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जबकि सबको पता है कि युद्ध में हजारों-हजार इंसानी जानें जाती हैं, परिवार तबाह होता, बच्चे अनाथ होते हैं। युद्ध के बाद का मंजर तो हद से ज्यादा भयावह होता है। आर्थिक तबाही जो होती है वह अलग… लेकिन इन सब से मीडिया को क्या मतलब? कौन सा इन एंकरों को युद्ध लड़ने जाना है। युद्ध तो गरीब और किसान परिवार से आने वाले युवाओं को लड़ना होता है।

लेकिन एक अच्छी बात ये है कि मीडिया की इस जालसाजी को अब आम जनता समझने लगी है। सोशल मीडिया से लेकर चौक चौराहों तक अब गोदी मीडिया के जहरीले बोल की चर्चा होने लगी है। बड़े अधिकारी, निष्पक्ष पत्रकार गोदी मीडिया के खिलाफ मुहिम छेड़ चुके हैं। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार जो खुद न्यूज एंकर हैं उन्होंने दर्शकों से ढाई महीने के लिए टीवी न देखने की अपील की है।

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गोदी मीडिया से नाराज पूर्व IPS ध्रुव गुप्त ने लिखा है ‘हमारे अपने देश में ही जैश और लश्कर के आतंकियों से भी ख़तरनाक कुछ लोग हैं जो सरकारी संरक्षण में देश को भावनात्मक रूप से बांटने और देशवासियों को मानसिक तौर पर पंगु और विक्षिप्त बनाने के सतत अभियान में लगे हुए हैं।

पाकिस्तान का इलाज करने से पहले अगर इन भूतों और भूतनियों का इलाज़ नहीं हुआ तो अगले कुछ सालों में यह समूचा देश पागलखानों में होगा।

किसी मिराज से इन्हें लाइन ऑफ कंट्रोल के उस पार गिरा आईए। यक़ीनन देश की नब्बे प्रतिशत से ज्यादा समस्याओं का स्वतः समाधान हो जाएगा।’