इस देश में हर साल लाखों बच्चें मरते हैं। कहीं ऑक्सीजन की कमी से, कहीं चमकी बुखार से, कहीं कुपोषण से और कहीं डॉक्टरों की हड़ताल से। दुनिया के किसी भी सभ्य देश में व्यवस्था की लापरवाही और संवेदनहीनता से पांच-दस बच्चें भी मरे होते तो पूरा देश सड़कों पर उतर आया होता। वहां की सरकारें हिल गई होंती अबतक।

हमारे देश में भी कुछ वर्षों पहले तक व्यवस्था की खामियों के विरुद्ध सड़कों पर सशक्त प्रतिरोध का इतिहास रहा है। अब अपना नपुंसक विरोध दर्ज़ करने के लिए व्यवस्था ने हमारे हाथों में सस्ते इंटरनेट का खिलौना और सोशल मीडिया का एक मंच थमा दिया है।

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सोशल मीडिया ने हमें अभिव्यक्ति का एक कारगर प्लेटफॉर्म ज़रूर दिया है, लेकिन हमारी तमाम मानवीय संवेदनाएं और दायित्व-बोध इसने हमसे छीन ली है।

यही वज़ह है कि मुजफ्फरपुर में कुपोषण से एक सौ से ज्यादा गरीब बच्चों के मरने के बाद भी केंद्र और राज्य की सरकारों का ज़मीर नहीं जगा है।

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खबरों के अनुसार इस मुद्दे पर हाल में आयोजित उच्च स्तरीय गोष्ठी में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ऊंघते हुए और बिहार के स्वास्थ मंत्री वर्ल्ड कप क्रिकेट का स्कोर दरयाफ़्त करते हुए पाए गए।

लोहिया जी ने सही कहा था कि सड़कें अगर सूनी होगी तो संसद आवारा हो जाएगी।

  • ध्रुव गुप्त