राम राज्य में सीता को धरती में समाना होगा और शंबूक वध तो होकर रहेगा। प्रतिक्रांति के बाद ये एक मुश्किल दौर है।उन्होंने सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति की दरारों और आपसी अंतर्विरोधों की पहचान कर ली और उनका इस्तेमाल कर लिया। समाजवादी और बहुजनवादी नेता इस बदलाव को समझ ही नहीं। शायद वे इसके लिए सक्षम ही नहीं थे, या फिर विरोधी ज़्यादा शातिर थे।

वे नेता अपने परिवार और बहुत महान हुआ तो अपनी जाति का हित साधने में लगे रहे और उनके पैर के नीचे की ज़मीन खिसक गई। तीस साल की बहुजनवादी, समाजवादी, लोहियावादी उथल पुथल के बाद राजनीति और समाज पर फिर से सवर्ण वर्चस्व क़ायम हो गया।

वे हार गए। इस दौर में सिर्फ पेरियार ने दम दिखाया है। पता नहीं कब तक? नुक़सान अब हर बहुजन का है। एक साथ सबको नहीं पीटेंगे। पर सब पिटेंगे। रिज़र्वेशन लगभग ख़त्म समझिए। लैटरल एंट्री से पद भरे जा रहे हैं। हिंसा कई शक्लों में नज़र आएगी।

न्यायपालिका, मीडिया, नौकरशाही, विश्वविद्यालय, कॉरपोरेट जगत सब पर सवर्ण नियंत्रण है। एक राजनीति थी, जहाँ आप कुछ थे। अब वह भी गया। एडवोकेट दरवेश यादव को नमन।