राहुल गांधी को पप्पू साबित करने की कोशिश के बाद केंद्रीय मंत्री अपने बयानों से खुद पप्पू साबित होते जा रहे हैं। नया मामला संतोष गंगवार का है। वे प्रधानमंत्री के 100 दिन पूरे होने पर प्रेस से बात कर रहे थे और उसी में फंस गए। ऐसे कि सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा, “उत्तर भारतीय युवा वाकई अयोग्य हैं तभी तो आज अयोग्य सत्ता का सुख भोग रहे हैं” (रवि पाठक)। मुझे लगता है कि ऐसी हालत के लिए प्रधानमंत्री को योग्य मीडिया सलाहकार नहीं मिलना भी जिम्मेदार है। हालांकि, जरूरी नहीं है कि वह उत्तर भारतीय हो फिर भी। अगर योग्य मीडिया सलाहकार होता तो प्रधानमंत्री जी एक धमाकेदार प्रेस कांफ्रेंस करते। उसमें, “जनता को लूटने वाले कुछ जेल में, कुछ कतार में” जैसे दावे करते और बस बल्ले-बल्ले रहती। कोई नहीं पूछता कि रिटायर जजों को ईनाम क्यों दिए गए हैं। दूसरी ओर, ना वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कारों की कम बिक्री के लिए ओला उबर को जिम्मेदार ठहराकर फंसतीं ना पीयूष गोयल आइंस्टीन न्यूटन में घालमेल करते और गणित को व्यर्थ बताते।

आइए आज देखें कि “उत्तर भारतीयों में योग्यता की कमी” को “सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा” के अखबारों ने कैसे छापा है। आप जानते हैं कि “भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है परन्तु पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है जो विश्व में भारत की पहचान बने। आज देश को एकता की डोर में बाँधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वो सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है।” अंग्रेजी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें किसी में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा मुझे और कोई भाषा आती नहीं है इसलिए भी मैं हिन्दी अखबार ही देख सकता हूं। विषय पर आने से पहले बता दूं कि आज नवोदय टाइम्स में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर का एक लेख है, “मोदी में मौजूद हैं लेवल-5 नेता की सभी खूबियां”। इससे पहले मोदी-टू कार्यकाल के 50 दिन पूरे होने पर भी नवोदय टाइम्स में ही प्रकाश जावेडकर ने ही लिखा था।

इससे लगता है कि प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार का काम भी प्रकाश जावेडकर कर रहे हैं। आप जानते हैं कि यह पद शुरू से खाली है और प्रधानमंत्री ने आज तक कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। हो सकता है कोई योग्य मीडिया सलाहकार न मिलने के कारण की हो पर केंद्रीय मंत्री से मीडिया सलाहकार का काम कराना और उनके पास इसके लिए समय होना – अलग योग्यता का मामला है जिसकी चर्चा अभी नहीं हो रही है। इस समय वे केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु मंत्री के साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्री भी हैं। पूर्व में मानव संसाधन विकास मंत्री रह चुके हैं। 68 साल के जावेडकर महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य हैं। 70 साल के संतोष गंगवार श्रम और रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं और वाजपेयी सरकार में भी राज्यमंत्री थे। तीन बार के सांसद हैं पर यह योग्यता का कम राजनीति का मामला ज्यादा है। वैसे स्मृति ईरानी बहुत कम ज्ञात राजनीतिक अनुभव के बावजूद केंद्रीय मंत्री हैं और उनके पास जैसा अनुभव है वैसे ही अनुभव के साथ हेमामालिनी मंत्री नहीं हैं।

अब मुद्दे पर आता हूं। हिन्दुस्तान में यह खबर पहले पन्ने पर टॉप में है और शीर्षक है, गंगवार के बयान पर राजनीतिक रार छिड़ी। इसके साथ लाल शीर्षक में एक छोटी सी खबर है, मंत्री ने दी सफाई। इसमें कहा गया है, मेरे बयान का गलत मतलब निकाला गया। मैंने एक विशेष संदर्भ में यह बात कही थी। मैंने कहा था कि कुछ नौकरियों के लिए स्किल की कमी थी, इसीलिए तो स्किल मिनिस्ट्री की शुरुआत की गई है ताकि बच्चों को नौकरी के मुताबिक प्रशिक्षण दिया जा सके। अखबार की मूल खबर इस प्रकार है – केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने शनिवार को कहा था, ‘देश में रोजगार की कमी नहीं है। हमारे उत्तर भारत में जो रिक्रूटमेंट करने आते हैं, इस बात का सवाल करते हैं कि जिस पद के लिए रख रहे हैं, उसकी योग्यता का व्यक्ति हमें कम मिलता है।’ कहने की जरूरत नहीं है कि इसके बाद सोशल मीडिया पर ट्रोल हुए और विपक्ष ने आड़े हाथों लिया तो पलट गए।

फिर भी योग्यता तो मुद्दा है ही। आज देखता हूं कि इस खबर को पेश करने वालों में किसकी योग्यता मंत्री जी को पंसद आती है। नवभारत टाइम्स ने इस खबर का शीर्षक लगाया है, जॉब हैं, काबिल लोग नहीं …. मंत्री पलटे जब विफरा विपक्ष। अखबार ने मंत्री जी फोटी की साथ दो खबरें लगाई हैं, पहले यह कहा और बाद में सफाई। अखबार ने इसके साथ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की तस्वीर और उनका एक बयान छापा है। ‘कभी खुशी-कभी गम चलता है’। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सुस्ती के दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था पर यह कहकर हिम्मत दी कि बुरा वक्त है, बीत जाएगा। उद्योगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। नागपुर में एक कार्यक्रम में गडकरी ने कहा कि जब मुझसे कुछ ऑटो-कंपनियों ने चिंता जताई तो मैंने कहा कि कभी खुशी होती है, कभी गम होता है। कभी आप सफल होते हैं और कभी आप असफल होते हैं। यही जीवन चक्र है।

दैनिक भास्कर ने भी इस खबर को पहले पन्ने पर छापा है – “रोजगार की कमी नहीं, उत्तर भारत में काबिलियत की कमी : संतोष गंगवार”। अखबार ने इसके साथ उपशीर्षक लगाया है, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा – उत्तर भारतीयों का अपमान किया है। हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि श्री गंगवार खुद उत्तर भारत से हैं और वे ऐसा नहीं कह सकते। प्रियंका गांधी ने कहा है, “श्रीमान मंत्री, आपकी सरकार के 5 साल से अधिक हो गए हैं। कोई रोजगार पैदा नहीं हुए हैं। जो भी नौकरियां थीं, वे सरकार द्वारा लाई गई आर्थिक मंदी के कारण छीन ली गई हैं। आप उत्तर भारतीयों का अपमान करके बचना चाहते हैं।”

दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर इस खबर का शीर्षक है, उत्तर भारतीयों की योग्यता पर सवाल उठाने पर घिरे गंगवार। अखबार ने संतोष गंगवार का अलग स्पष्टीकरण छापा है जो इस प्रकार है, रविवार को ऐसे दी सफाई। “मैंने उत्तर भारतीयों को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। यदि कोई ऐसा कह रहा है तो मेरे सामने प्रमाण लाए। मैंने गुणवत्ता ठीक करने की बात की थी।” (ग्वालियर से दिल्ली लौटते वक्त फोन पर हुई बातचीत के अनुसार)। जागरण संवाददाता की मूल खबर में कहा गया है, मोदी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर शनिवार को गंगवार ने बरेली में प्रेस वार्ता की थी। देश में मंदी और नौकरी न होने के सवाल पर उन्होंने कहा था कि नौकरियों की कमी नहीं है। उत्तर भारत में जो कंपनियां भर्ती के लिए आती हैं, उनमें से कुछ के प्रतिनिधियों ने बताया कि उनके काम के अनुसार गुणवत्ता नहीं मिल पाती। हम युवाओं को उस लायक बनाने पर काम कर रहे हैं। रोजगार कार्यालयों में बेरोजगारों की लंबी सूची के बाबत तर्क दिया कि बड़ी संख्या में पंजीकृत युवा अच्छी नौकरी हासिल कर चुके हैं। उससे भी बेहतर मौके पाने की तलाश में वे अपना पंजीकरण निरस्त नहीं कराते। इसलिए सूची लंबी है।

राजस्थान पत्रिका में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बड़े अखबार अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। इस मामले में खास बात यह है कि अगर मंत्री जी के पलट जाने के बाद की उनकी बात को ही कहा माना जाए तो सवाल उठता है कि नियुक्ति के लिए आने वाली कंपनियों को अगर योग्य उम्मीदवार नहीं मिलते हैं तो कंपनियां क्या करती हैं। दक्षिण या भारत के दूसरे हिस्से में उम्मीदवार तलाश लेती हैं या विदेशी भारत काम करने जाते हैं। चूंकि विदेशियों के भारत नौकरी करने आने के मामले कम हैं और अयोग्य युवाओं को (अयोग्य होने के कारण ही सही) नौकरी नहीं मिल रही है तो बेरोजगारी है यह बात मंत्री जी क्यों नहीं मान ले रहे हैं। इसके अलावा, देश के जो लोग विदेश में नौकरी करने जाते हैं उनके बारे में मंत्री जी की राय क्या है।

( ये लेख संजय कुमार सिंह की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है )