प्रतीकात्मक तस्वीर

आपका बच्चा बीमार है. मरने की हालत में है. आप पहले आलीशान बंगला बनवाएंगे या बच्चे को अस्पताल ले जाएंगे?

आप कहेंगे कि ये कैसा पागलपन से भरा सवाल है? लेकिन देश इसी पागलपन के हवाले हो चुका है.

मरीज अस्पताल के बाहर दम तोड़ रहे हैं, उन्हें बिस्तर नहीं मिल रहे हैं, डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं. सरकार में बैठी पार्टी सैकड़ों आलीशान दफ्तर बनवाने की घोषणा कर रही है.

जेपी नड्डा ने घोषणा की है कि ‘अमित शाह के नेतृत्व में 500 नये दफ्तर बनाए गए, 400 और नए दफ्तर बनाए जाएंगे’.

अभी दो दिन पहले की बात है, गुना में एक महिला अपने टीबी के मरीज पति को अस्पताल ले गई थी. उसके पास पर्ची कटाने के पांच रुपये नहीं थे. अपने मासूम बच्चे के साथ पति पत्नी जिला अस्पताल के सामने रात भर पड़े रहे. आखिरकार उसकी मौत हो गई.

आज मैंने सोचा कि ऐसी घटनाओं के बारे में लिखता हूं जहां लोगों को अस्पताल न मिलने से मौत हुई हो. मीडिया में देश भर से ऐसी खबरें भरी पड़ी हैं. पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक.

34000 लोगों की मौत हो चुकी है, संक्रमण का आंकड़ा 15 लाख पार कर गया है. पार्टियां दफ्तर बनवा रही हैं. सेंट्रल विस्टा बनवा रही हैं. विधानभवन बनवा रही हैं. मंदिर बनवा रही हैं. सरकार गिरा रही हैं, सरकार बना रही हैं. जनता जो कोरोना से बचेगी, वह बाढ़ में बह जाएगी. ये सरकारें और पार्टियां कुल मिलाकर लोगों को उल्लू बना रही हैं.

हैरानी इस बात की है कि जनता अभाव में मरने को तैयार है, लेकिन सवाल उठाने या नाराजगी जाहिर करने को तैयार नहीं है.

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