सत्ताधारी दल के समर्थक और मीडिया के तमाम लोग किसानों को भले ही खालिस्तानी समर्थक या चरमपंथी समर्थक कहकर विलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वैकल्पिक मीडिया में किसानों के पक्ष में जोरदार आवाज उठाई जा रही है।

इसी की मिसाल है बीबीसी में ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट सर्वप्रिया सांगवान का ये फेसबुक पोस्ट, जिसमें किसानों के बीच जाकर रिपोर्टिंग करने के अपने अनुभव को साझा कर रही हैं-
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एनएच10 पर किसानों का एक लंबा क़ाफ़िला चला जा रहा है। क़ाफ़िले के टेम्पो-ट्रैक्टरों की ट्राली में बैठे किसान गुज़रती हुई गाड़ियों को देख रहे हैं। अक्सर ऐसा नज़ारा सेना के ट्रकों का होता है। हम उन सेना के जवानों को हाथ हिलाते हुए या सलूट करते हुए आगे बढ़ जाया करते हैं। वे जवान दूर सरहद पर जा रहे होते हैं और आज किसान अपने देश के अंदर ही राज्य की सरहदों पर डटे हुए हैं।

ये लोग दृढ़ हैं कि चाहे एक साल लगे या दो साल, ये लोग अब पीछे नहीं हटेंगे। ये लोग अपना राशन लेकर आए हैं, सोने के लिए गद्दे और कंबल भी। कह रहे हैं कि शिफ़्ट लगा कर डटे रहेंगे। लेकिन फिर भी इनका रास्ता रोका जा रहा है।

आम लोगों को लग रहा है कि किसानों ने रास्ते रोक दिए लेकिन फ़िलहाल तो रास्ते पुलिस ने रोके हुए हैं। क्या इसलिए ताकि आम लोग ऐसा ही सोचें?

सवाल ये भी है कि इतने लोगों को दिल्ली आने की नौबत क्यों आयी? क्योंकि ये प्रदर्शन आज से नहीं चल रहा, दो महीने से चल रहा है। तो इस बीच हल निकालने की कितनी कोशिशें हुई हैं?

फ़िलहाल सरकार की ज़बानी बात पर किसानों को भरोसा नहीं है और वे चाहते हैं कि जो उन्हें कहा जा रहा है, वही बात लिखित में दे दी जाए। कई किसान देश में बढ़ते निजीकरण को लेकर भी चिंता जता रहे हैं।

सीएए के ख़िलाफ़ जब धरना हो रहा था, तब भी इसी तरह की बातें कही जा रही थी। इन्हें भी तरह-तरह के नाम दिए जा रहे हैं। हिंदू-मुसलमान-सिख होने ना होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा।

इन्हें जानने के लिए अब प्रेस के भरोसे मत रहिए। ख़ुद ही एक बार जाकर बात कर लीजिए कि ये लोग कौन हैं और क्या चाहते हैं। क्यों सर्दी में ये बुज़ुर्ग सड़कों पर निकले हैं, क्यों रास्ते में बैठ कर ख़ुद ही आटा गूँथ रहे हैं, प्याज़ काट रहे हैं। अगर ये चरमपंथी हैं तो इनके हाथ में बन्दूकों की बजाय बर्तन क्यों हैं? कोई आपसे भी ऐसा ज़रूर पूछेगा जैसा मुझसे पूछा गया- “बेटा जी, चाय पियोगे?”

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