चूड़ी के कारोबार के लिए मशहूर फिरोज़ाबाद संसदीय क्षेत्र में इस बार चुनावी संग्राम एक ही परिवार के दो सदस्यों के बीच है। यहां समाजवादी पार्टी के मौजूदा सांसद अक्षय प्रताप यादव की सीधी टक्कर अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव से है। ऐसा माना जा रहा है कि इस टक्कर का फायदा बीजेपी को मिल सकता है।

ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि यादव, जाट और मुस्लिम वोटरों के वर्चस्व वाली इस सीट पर शिवपाल के सपा के खिलाफ खड़े होने से मुस्लिम वोटों का बिखराव हो सकता है, जिसका सीधा फाय़दा बीजेपी प्रत्याशी डॉ. चंद्रसेन जादौन को मिलेगा। शिवपाल की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का दावा है कि इलाके के मुस्लिम वोटर्स शिवपाल के साथ हैं। हाल ही में इलाके के कई बड़े मुस्लिम चेहरे पार्टी से जुड़े हैं। ऐसे में मुस्लिम वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है।

हालांकि, मुस्लिम वोटों के बिखराव के बावजूद भी अक्षय यादव की दावेदारी मज़बूत नज़र आ रही है, वजह है मायावती का सपा के साथ आना। यहां बीएसपी के करीब 3 लाख वोटर हैं। गठबंधन के बाद अब यह वोटर्स संभावित रूप से अक्षय यादव के पक्ष में जा सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो अक्षय यादव को जीतने से कोई नहीं रोक सकता।

पांच विधानसभा सीटों (टुंडला, जसराना, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद और सिरसागंज) वाली फिरोज़ाबाद लोकसभा सीट में 17.85 लाख वोटर्स हैं। पिछले चुनाव में मोदी लहर के बावजूद यह सीट सपा के खाते में गई थी। सपा के अक्षय यादव को कुल 5 लाख से ज्यादा यानी 48.4% वोट मिले थे वहीं भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को 38 फीसदी वोट मिले थे।

क्या है इस सीट का जातीय समीकरण

फिरोजाबाद में यादव वोटर्स सबसे अधिक हैं, जो करीब चार लाख 31 हजार हैं। वहीं जाटव समाज के वोटरों की संख्या करीब दो लाख 10 हजार, क्षत्रिय समाज के वोटरों की संख्या एक लाख 65 हजार, मुस्लिम वोटरों की संख्या करीब एक लाख 56 हजार, ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या करीब एक लाख 47 हजार और लोधी समाज के वोटरों की संख्या करीब एक लाख 21 हजार है। 2019 के चुनाव में भी इस सीट पर मुस्लिम, जाटव और यादव वोटरों का समीकरण बड़ी भूमिका निभा सकता है।

क्या है इस लोकसभा सीट का इतिहास  

करीब दो दशकों से सपा के वर्चस्व वाली फिराज़ाबाद लोकसभा सीट पर शुरुआती चुनावों में किसी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं दिखा। इस सीट पर 1957 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए जिसमें निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। 1967 में सोशलिस्ट पार्टी ने यहां से चुनाव जीता और फिर 1971 में कांग्रेस ने यहां पर जीत हासिल की। 1977 से लेकर 1989 तक हुए कुल चार चुनाव में भी कांग्रेस सिर्फ एक बार ही जीत पाई।

1991 के बाद लगातार तीन बार यह सीट बीजेपी के खाते में गई। बीजेपी के प्रभु दयाल कठेरिया ने यहां जीत की हैट्रिक लगाई। उसके बाद 1999 और 2004 में समाजवादी पार्टी के रामजी लाल सुमन ने बड़ी जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी के कुंवर अखिलेश यादव ने भी 2009 में इस सीट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

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हालांकि चुनाव के बाद उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया था। 2009 में कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने चुनाव जीता और 2014 में समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव ने यहां से बड़ी जीत दर्ज की।