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अक्सर एक्टिविस्ट और आलोचकों की ओर से ये दावा किया जाता है कि सरकारें किसानों के नाम पर जो फसल बीमा योजनाएं निकालती हैं उनसे असल में कंपनियों का फायदा होता है ना कि किसानों का। मोदी सरकार की फसल बीमा योजना को देखकर भी ऐसा ही प्रतीत होता है।

केंद्र की मोदी सरकार ने 2016 में एक नई फसल बीमा योजना का ऐलान किया था। सरकार ने इस योजना को लेकर कई दावे किये थे। लेकिन अगर इस योजना को देखा जाए तो लगता है कि सरकार किसानों के नाम पर निजी कंपनियों को हज़ारों करोड़ का फायदा देकर कथित तौर पर बड़े घोटाले को अंजाम दे रही है।

मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत की थी। इस योजना को पहले से चल रही राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना की जगह लाया गया था। इसके तहत उन आपदाओं के दायरे में विस्तार किया गया जिनसे फसल को नुकसान पहुंचता है।

लेकिन अगर संसद के आकड़ों को देखा जाए तो समझ आता है कि फसल बीमा योजना के नाम पर कंपनियों को हजारों करोड़ का फायदा हो रहा है और किसानों की भागीदारी इसमें कम होती जा रही है।

कृषि मंत्रालय के राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेकावत ने सांसद झारना दास बैद्य के एक प्रश्न के जवाब में फसल बीमा योजना से सम्बंधित कुछ आकड़े दिए। इनके मुताबिक, अबतक फसल बीमा कंपनियों को जिनमें से अधिकतर निजी हैं इस योजना से 16000 करोड़ रुपियें की कमाई हो चुकी है।

2016-17 में, कंपनियों को दो फसल के मौसमों में, कुल 22,571 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में एकत्र किए गए थे। स्वीकृत दावों के आधार पर मुआवजा बीमा भुगतान 15,350 करोड़ रुपये था। मतलब केवल इतने रुपियें कंपनियों ने किसानों के बीमा दावों में दिए। यानि इसने बीमा कंपनियों को 7201 करोड़ रुपये के शुद्ध सकल लाभ दिया।

खरीफ 2017 में, कंपनियों ने और भी ज्यादा प्रीमियम एकत्र किया जबकि किसानों की संख्या में गिरावट आई थी। कुल मिलाकर प्रीमियम के रूप में 19,698 करोड़ रुपये का शुद्ध धन एकत्र किया और दावों के निपटारे के रूप में कुल 10,799 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इससे उन्हें 8,898 करोड़ रुपियें का फायदा हुआ, मतलब 45 प्रतिशत का पैसा बच गया।

अब देखते है कि इस से किसानों को कितना फायदा है। बीमा कम्पनियाँ किसानों के नाम पर हजारों करोड़ रुपियें कमा रही हैं लेकिन दूसरी तरफ किसानों को बीमा के नाम पर सिर्फ इन्तेज़ार मिल रहा है। बीमा पाने के लिए उन्हें नुकसान कंपनियों को साबित करना होता है जिसमें कंपनियों पर मनमानी करने के कई आरोप लग चुके हैं।

किसानों की हताशा को उनकी नामांकन में आई कमी से समझा जा सकता है। योजना में किसानों के नामांकन में लगभग 15 प्रतिशत की कमी आई है। पहले वर्ष (2016-17) में, लगभग 5.72 करोड़ उम्मीदवार किसानों ने पीएमएफबीवाई के लिए साइन अप किया था। अगले वर्ष (2017-18), संख्या 4.9 करोड़ रह गई थी।

कृषि राज्य मंत्री गजेन्द्र सिंह शेकावत ने संसद में खुद बताया कि 2017-18 में जुलाई के अंत तक केवल 20,000 दावों में से केवल 6083 दावों का निपटारा किया गया। मतलब 50% से भी कम।