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औरंगाबाद

टीवी और सिनेमा की स्टीरियोटाइपिंग की वजह बिहार को लेकर गैरबिहारी लोगों के दिमाग में जो प्रतिबिंब बनता है… कुछ वैसा ही है औरंगाबाद। पिछड़ा, गरीब, सुविधा विहीन।

लेकिन इतिहासकार अपनी किताबों में इस क्षेत्र के लोग प्रगतिशील सोच का मानते हैं। बिहार के गौरवशाली इतिहास का पन्ना पलटने पर कुछ महिमामंडन औरंगाबाद के हिस्से मिलता है। हो भी क्यों न प्राचिन मगध जनपद का हिस्सा रहा है औरंगाबाद क्षेत्र।

नेताओं के भाषण और सरकारी दस्तावेज में औरंगाबाद बिहार का नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। वहीं नक्सल जो अपने इतिहास के सबसे कमज़ोर क्षण पर खड़े हैं। लेकिन सरकार इनसे आज-तक मुकाबला ही कर रही है। जिले के मदनपुर, देव, नवीनगर में CRPF के कई लगे हैं। फिर हमला हो ही जाता है।

ऐसा लगता है यहां सरकार से ज्यादा नक्सलियों के इरादे मजबूते हैं। ख़ैर इस बार इस सीट से कुल 9 प्रत्याशी मैदान में हैं।

1. सांसद सुशील कुमार सिंह, भाजपा
2. उपेन्द्र प्रसाद, महागठबंधन (हम)
3. नरेश यादव, बसपा
4. सोमप्रकाश सिंह, स्वराज पार्टी (लोकतांत्रिक)
5. डा. धर्मेन्द्र कुमार, अखिल हिन्द फारवर्ड ब्लॉक (क्रांतिकारी)
6. संतोष कुमार सिन्हा, निर्दलीय
7. धीरेन्द्र कुमार सिंह, निर्दलीय
8. अविनाश कुमार, पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (डेमोक्रेटिक)
9. योगेन्द्र राम, निर्दलीय

महागठबंधन से यह सीट जीतन राम मांझी के ‘हम’ पार्टी के हिस्से आयी है। और इस सीट पर राजनीतिक चुटकुला ये है कि जिस मायावती को ‘राजद’ देशभर में प्रत्यक्ष रूप से मौखिक समर्थन दे रही है। उस मायावती की पार्टी ‘बसपा’ यहां महागठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ रही है।

लेकिन इस से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि यहां बसपा का ज्यादा वोट नहीं है। मुकाबला महागठबंधन और NDA के बीच है। 2014 में ये सीट कथित मोदी लहर में भाजपा के हाथ लग गई। सांसद बने सुशील कुमार सिंह। इस बार भी NDA की तरफ से यही उम्मीदवार हैं। 2014 से पहले 2009 में यह सीट नीतीश कुमार की जनता दल (यू) के पास थी।

2009 में भाजपा और जनता दल (यू) यहां साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। 2014 में अलग अलग। अब 2019 में दोनों फिर एक साथ हैं। लेकिन इस सीट का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यह कांग्रेस का गढ़ रहा है। 1950 से लेकर 2014 के बीच इस सीट पर 18 बार लोकसभा के चुनाव हुए। 9 बार कांग्रेस जीती। कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा स्वतंत्र पार्टी, समता पार्टी और जनता दल के नेता चुने गए हैं।

लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है। समिकरण समझिए…

पिछली बार इस सीट से भाजपा उम्मीदवा को 307941 वोट मिले थे यानी लगभग 39.16 प्रतिशत। दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार को मिले थे 241594 वोट यानी लगभग 30.72 प्रतिशत। तीसरे नंबर पर रहे जनता दल (यू) के उम्मीदवार को मिले थे 136137 वो यानी लगभग 17.31 प्रतिशत।

इस बार भाजपा और जनता दल (यू) साथ चुनाव लड़ रहे हैं। यानी अगर सीधा गणित लगाते हुए भाजपा और जनता दल (यू) का वोट मिला दिया जाए तो वोट प्रतिशत हो जाएंगे लगभग 69.88 प्रतिशत।

लेकिन राजनीति अगर इतनी ही सीधी होती तो बात ही क्या थी। पिछले चुनाव में कांग्रेस को इस सीट पर अकेले 30.72 प्रतिशत वोट मिले थे।

इस चुनाव में कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा है। एक ट्विस्ट और है… इस सीट पर राजद का वोट भी बढ़िया है। इतना बढ़िया कि 2009 के लोकसभा चुनाव में राजद का प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहा था। वोट मिले थे- 188095

इस बार महागठबंधन से यह सीट जीतन राम मांझी को मिली है। जीतनराम मांझी के वोट बैंक हैं दलित और महादलित। औरंगाबाद लोकसभा सीट के अंदर 6 विधानसभा के सीट हैं जिसमें से 2 आरक्षित हैं। यानी इस सीट पर दलित-महादलित वोटरों की संख्या सबसे अधिक है। लगभग 19 प्रतिशत।

राजद जिस मुस्लिम और यादव समीकरण को साधती है उस समीकरण के लिए भी यहां पर्याप्त आंकड़े हैं। इस सीट पर मुस्लिम वोटर लगभग 8 प्रतिशत और यादव वोटर लगभग 10 प्रतिशत हैं। तो ‘हम’ पार्टी के उम्मीदवार को दलित और महादलित वोट के आलावा मुस्लिम और यादव वोट भी मिलेंगे।

उम्मीदवार की बात करें तो महागठबंधन ने जिस उप्रेंद्र प्रसाद को टिकट दिया वो टिकट बंटवारे से पहले जनता दल (यू) में थें। डॉ उप्रेंद्र प्रसाद शिक्षित और जमीन नेता हैं। डॉ उप्रेंद्र प्रसाद ने अर्थशास्त्र में एम. ए., पी-एच.डी., एल.एल.बी. और पत्रकारिता (पटना विश्वविद्यालय) की है। जानकी प्रकाशन से इनकी एक किताब भी प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है शुद्रों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति

सवर्णों का रहा है वर्चस्व

लेकिन इस समिकरण के आधार पर भी भाजपा को बहुत कमजोर नहीं बताया सकता। क्योंकि यहां राजपूत वोट 17 प्रतिशत से ज्यादा है। भूमिहार और ब्राह्मण वोट 8 प्रतिशत है… इस 8 प्रतिशत पर बीजेपी का एकाधिकार समझा जाता है। अब तक इस सीट से चुने गए सांसदों की लिस्ट पर नजर डालने से पता चलता है कि यहां से सिर्फ और सिर्फ सवर्ण सांसद चुने गए हैं।

सबसे अधिक बार इस सीट से चुने गए नेता का नाम है सत्येन्द्र नारायण सिन्हा। जाति से भूमिहार। 5 बार कांग्रेस के टिकट पर और 2 बार जनता दल के टिकट पर चुने गए। यानी कुल 7 बार। इलाके में सत्येन्द्र नारायण सिन्हा ‘छोटे साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। 1989 में सत्येन्द्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री भी बने।

2004 में कांग्रेस की टिकट से सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के बेटे निखिल कुमार भी इस सीट से चुने गए। बाद में निखिल ने केरल और नागालैंड के राज्यपाल का पद संभाला।

सवर्णों के वर्चस्व वाले इस सीट पर महागठबंधन और NDA प्रत्याशी के बीच मुकाबला जोरदार है। जमीन पर कई फैक्टर काम करते हैं। अगर महागठबंधन यहां जाति का समिकरण साधने में कामयाब रही तो सफलता मिलना लगभग तय है।