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बिहार के बांका जिला में 11 तहसील हैं- बांका, रजौन, अमरपुर, धोरैया, कटोरिया, बौसी, शंभुगंज, बाराहाट, बेलहर, चांदन, तेलोन्ध फूल्लीडूमर। विकिपीडिया बताता है कि 1979-80 में भागलपुर का कुख्यात अखफोड़वा कांड रजौन थाने से ही शुरू हुआ था, और सबसे ज्यादा कांड यहीं हुआ था। इसी कांड पर प्रकाश झा ने गंगाजल फिल्म बनाई थी।

यह जिला राज्य के दक्षिण-पूर्व भाग में स्थित है। यह बिहार के मैदानी क्षेत्र का आखिरी सिरा और झारखंड और बिहार के सीमा का मिलन स्थल है। बांका की पूर्वी और दक्षिण सीमाएं झारखण्ड राज्य के क्रमशः गोड्डा और देवघर जिले से मिलती हैं।

बांका जिला 21 फरवरी 1991 से पहले भागलपुल जिले का अनुमंडल हुआ करता था। लेकिन बांका और भागलपुर लोकसभा क्षेत्र आजाद भारत के दूसरे आमचुनाव से ही अलग-अलग हैं। दूसरे चुनाव से इसलिए क्योंकि 1957 में ही बांका लोकसभा का गठन किया हुआ था।

कहा जा सकता है कि इस लोकसभा क्षेत्र में बहुत वेराइटी बहुत है। इतिहास गवाह है कि इस सीट से लगातार दो बार सांसद बनने का मौका सिर्फ शकुंतला देवी को ही मिला है। शकुंतला देवी ही बांका की पहली सांसद (1957) चुनी गई थीं। हालांकि दिग्विजय सिंह भी दो बार लगातार सांसद चुने गए लेकिन वे 1998 एवं 99 में हुए चुनाव में, पांच साल के अंतराल पर हुए चुनाव में नहीं। गिरिधारी यादव को भी यहां से दो बार सांसद बनने का मौका मिला लेकिन लगातार नहीं।

बांका की जमीन से केंद्रीय मंत्री भी हुए हैं और राज्य को मुख्यमंत्री भी, बावजूद इसके राज्य की हालत खस्ता है। बांका में पिछला चुनाव यानी 2014 का लोकसभा चुनाव दिलचस्प रहा था रहा था। लेकिन इस बार चुनावी समीकरण थोड़ा उलझा हुआ है।

वैसे तो इस सीट पर कुल 20 प्रत्याशी मैदान में है। लेकिन तीन ही ऐसे हैं जिन्हें टक्कर में माना जा सकता है। हालांकि तमाम निर्दलीय और कथित छोटे दल के उम्मीदवार भी परिणाम पर असर डालेंगे ही।

तो कौन कौन हैं वो 20 प्रत्याशी-

गिरिधारी यादव- जदयू
जयप्रकाश नारायण यादव- राजद
रफीक आलम- बसपा
नीलू देवी- भारतीय दलित पार्टी
फैसल अंसारी- मोमिन फ्रंट पार्टी
राजकिशोर यादव उर्फ पप्पू यादव- झारखंड मुक्ति मोर्चा
कैलाश प्रसाद सिंह- प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया)

पुतुल कुमारी- निर्दलीय
उमाकांत यादव- निर्दलीय
अमरजीत कुमार- निर्दलीय
एमपी यादव- निर्दलीय
नरेश यादव- निर्दलीय
मृत्युंजय राय- निर्दलीय
संजीव कुमार कुणाल- निर्दलीय
सैयद अलमदार हुसैन- निर्दलीय
प्रमोद सिंह वेल्डन- निर्दलीय
प्रवीण झा व मनोज साह- निर्दलीय
मो.मुख्तार आलम- निर्दलीय
पवन ठाकुर- निर्दलीय

वो तीन प्रत्याशी जो टक्कर में बताए जा रहे हैं?

महागठंबधन की तरफ से उम्मीदवार हैं राजद नेता और मौजूदा सांसद जयप्रकाश नारायण यादव। एनडीए की तरफ से उम्मीदवार हैं जनता दल (यू) नेता गिरिधारी यादव। तीसरी उम्मीदवार हैं भाजपा की बागी निर्दलीय प्रत्याशी पुतुल कुमारी

ग्राउंड रिपोर्ट करने वाले पत्रकार तो ये भी दावा कर रहे हैं कि पुतुल कुमारी के बागी होने से भाजपा इस सीट पर कमजोर हो गई है। इस तरह असली लड़ाई महागठंधन प्रत्याशी जयप्रकाश नारायण यादव और निर्दलीय पुतुल कुमारी के बीच है।

पुतुल कैसे बन गईं चुनावी फैक्टर?

इसकी शुरुआत होती है 1998 के लोकसभा चुनाव से। पुतुल के पति दिग्विजय सिंह SAP के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं। 1999 में फिर चुनाव होता है और इस बार दिग्विजय सिंह जनता दल (यू) के टिकट से चुनाव जीतते हैं।

इन दोनों चुनाव में दूसरे नंबर पर रहते हैं राजद के गिरधारी यादव। समय का चक्र धूमता है और 2004 के लोकसभा चुनाव में गिरधारी यादव दिग्विजय सिंह को हरा देते हैं। इस हार के बाद 2009 के चुनाव में जनता दल (यू) दिग्विजय सिंह का टिकट काट देती है। बावजूद इसके दिग्विजय सिंह निर्दलीय लड़ते हैं राजद प्रत्याशी जयप्रकाश नारायण यादव को हराते हैं।

इस बीच दिग्विजय सिंह का जीवन चक्र पूरा होता है और बांका की जनता पर एक साल के भीतर ही नया सांसद चुनने का जिम्मा आता है। बांका की जनता को दिग्विजय सिंह का वो काम याद आता है जो उन्होंने रेल राज्य मंत्री रहते हुए अपने क्षेत्र के लिए किया था। जैसे- बांका में रेल लाना

इस तरह 2010 का बाई पोल दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल कुमारी सहानुभूति लहर में जीत जाती हैं। इस बार भी हारते हैं राजद प्रत्याशी जयप्रकाश नारायण यादव

फिर आता है 2014 का लोकसभा चुनाव और साथ लाता है कथित मोदी लहर। लेकिन बिहार तो ऐसे लहरों की लंका लगाने के लिए जाना जाता है…. सो लगा दिया।

बीजेपी ने पुतुल कुमारी को टिकट दिया और राजद ने फिर जयप्रकाश नारायण यादव पर दांव खेला। दो बार हारने वाले जयप्रकाश नारायण मोदी लहर को ठेंगा दिखाकर जीत गए। हालांकि हार-जीत अंतर बहुत ही कम था।

तो पुतुल कुमारी की इसी हार को आधार बनाकर 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उनका टिकट काट दिया है। लेकिन पुतुल का दावा है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। जमीन पर उनका जनाधार है। लेकिन बीजेपी ने इस दलील को नहीं माना और राजद के टिकट पर चुनाव जीतने वाले गिरिधारी यादव को अपने टिकट से मैदान में उतार दिया। इस बात से नाराज पुतुल कुमारी जमकर बीजेपी के खिलाफ प्रचार कर रही हैं।

बीजेपी ने जिस गिरिधारी यादव को टिकट दिया है उनका राजनीतिक करियर इस प्रकार है-

गिरिधारी सबसे पहले 1995 में कटोरिया से विधायक चुने गए। उसके बाद 1996 1998 तक बांका से एमपी रहे। उसके बाद 2000-2004 तक फिर कटोरिया विधायक रहे। वर्तमान में गिरिधारी यादव जनता दल (यू) से बेलहर के विधायक हैं।

अब इसका मतलब ये नहीं है कि महागठबंधन प्रत्याशी और राजद नेता जयप्रकाश यादव कच्चे खिलाड़ी है। जयप्रकाश यादव बिहार सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री और शिक्षा मंत्री रहे हैं। यूपीए की सरकार में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री रहे हैं और फिलहाल बांका से सांसद हैं।

सांसद रहते हुए जयप्रकाश यादव ने क्षेत्र की जरूरत के मुताबिक 42 पुल बनवाए हैं। तो इस ऐसे ही कुछ विकास कार्य और राजद के मुस्लिम यादव समीकरण के साथ जयप्रकाश यादव मजबूती से मैदान में हैं।

जातीय समीकरण

जातीय समिकरण भी महागठंधन के लिए अनुकूल है। बांका लोकसभा क्षेत्र में सबसे अधिक यादव जाति का मत है करीब 3 लाख। मुस्लिम वोटरों की संख्या भी करीब दो लाख है। ढाई लाख करीब महादलित व एक लाख के आसपास अन्य जातियों के वोटर हैं।

हालांकि एनडीए की तरफ से भी यादव उम्मीदवार होने की वजह से यादव वोट बिखर सकते हैं। इसके आलावा इस सीट पर एक लाख कुर्मी, 80 हजार कोइरी वोट हैं। माना जाता है कि कुर्मी-कोइरी वोट जदयू को मिलता रहा है।

जहां तक सवर्ण वोटों की बात है तो राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार व कायस्थ मतदाता करीब साढ़े तीन लाख हैं। लेकिन ये वोटर इस बार बीजेपी से नाराज हैं। नाराजगी की वजह यादव उम्मीदवार को टिकट देना और पुतुल कुमारी का टिकट काटना है। ऐसे में सवर्ण वोट पुतुल कुमारी के साथ लामबंद हो सकते हैं।

लेकिन बीजेपी इसमें सेंध लगाएगी। स्वघोषित राष्ट्रवादी सवर्ण बीजेपी के कथित राष्ट्रवादी मूव की वजह से अपना वोट गिरिधारी यादव को देने के लिए मजबूर होगी। बावजूद इसके सवर्णों का जितना वोट पुतुल कुमारी काटेंगी, उसका सीधा फायदा महागठबंधन को मिलेगा।

इस समीकरण को देखते हुए पुतुल कुमारी वोट कटवा लग सकती हैं। लेकिन एक दूसरे समीकरण से पुतुल कुमार का दावा थोड़ा मजबूत लगने लगता है। दरअसल बांका से ही झामुमो नेता राजकिशोर प्रसाद उर्फ पप्पू यादव भी मैदान में हैं। इस तरह ‘राजद’ का यादव वोट दो पुराने यादव नेता ही काट सकते हैं।

कुछ मुस्लिम वोट बसपा उम्मीदवार रफीक आलम काट सकते हैं। इसके अलावा पिछले चुनाव में 2.20 लाख वोट लानेवाले वामपंथी नेता संजय यादव भी पुतुल के समर्थन में है। इस समीकरण से अगर पुतुल कुमारी जीत जाती हैं तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।

कुल मिलाकर मामला पेचीदा है। पर्दे के पीछे से कई प्रत्याशी एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। जातीय समीकरण भयंकर तरीके से उलाझा हुआ है। लेकिन इतना तो तय है कि लड़ाई महागठबंधन, एनडीए और निर्दलीय पुतुल कुमारी के बीच ही है। मतदान के 24 घंटे पहले भी अगर कुछ प्रतिशत का वोट अगर इधर से उधर होता हैं तो चुनावी विश्लेषकों का दिया परिणाम शीर्षासन कर लेगा।