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देश के बैंकों की स्थिति बिगडती जा रही है। फंसे हुए कर्ज (एनपीए) की समस्या बैंकों के लिए अभिशाप बन गई है। अब जो खुलासा सामने आया है उसके बाद मोदी सरकार को अन्य आर्थिक मामलों के साथ इसे लेकर भी विरोध का सामना करना पड़ सकता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में बैंकों का एन.पी.ए 322.21% बढ़ गया है।

एन.पी.ए बैंकों का वो लोन होता है जिसके वापस आने की उम्मीद नहीं होती। इस कर्ज़ में 73% से ज़्यादा हिस्सा उद्योगपतियों का है।

अक्सर उद्योगपति बैंक से कर्ज़ लेकर खुद को दिवालिया दिखा देते हैं और उनका लोन एन.पी.ए में बदल जाता है। यही उस लोन के साथ होता है जिसे बिना चुकाए नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग देश छोड़कर भाग जाते हैं।

हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस की यूपीए सरकार को एन.पी.ए का ज़िम्मेदार बताया था। लेकिन एक आरटीआई द्वारा सामने आए आकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं।

आरटीआई में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से पूछा गया कि देश में जून 2014 से जून 2018 तक सरकारी बैंकों के एन.पी.ए की क्या स्थिति है। इसके जवाब में बताया गया कि बीते  चार साल के दौरान देश में सरकारी बैंकों के एन.पी.ए में 322.21% का इज़ाफा हुआ है।

इसके अलावा आरटीआई में केन्द्रीय बैंक से जानकारी मांगी गई कि 30 जून 2018 को सरकारी बैंकों का कितना एन.पी.ए है और इस तारीख तक कितने एनपीए की रिकवरी सरकारी बैंकों द्वारा की गई है?

आरटीआई के जवाब में केन्द्रीय रिजर्व बैंक ने कहा कि उसके पास एन.पी.ए का आंकड़ा महज दिसंबर 2017 तक का मौजूद है और इसके बाद के आंकड़ों के लिए इंतजार करने की जरूरत है। लिहाजा आरबीआई ने जून 2014 से दिसंबर 2017 तक का वह आंकड़ा जारी किया है जो सरकारी बैंक उसे मुहैया करा चुके हैं।

आरबीआई के मुताबिक 30 जून 2014 तक देश के सरकारी बैंकों का ग्रॉस एन.पी.ए 2.24 लाख करोड़ रुपए था। यह एनपीए 31 दिसंबर 2017 तक बढ़कर 7.24 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया।

वहीं आरटीआई के अखिरी सवाल के जवाब में रिजर्व बैंकं ने बताया कि अप्रैल 2014 से लेकर मार्च 2018 तक सरकारी बैंकों ने 1,77,931 करोड़ रुपए की कुल वसूली की है।

गौरतलब है कि लगातार सामने आ रहे बैंक घोटालों के चलते बैंकों का घाटा भी बढ़ता जा रहा है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सामूहिक शुद्ध घाटा 2017-18 में बढ़कर 87,357 करोड़ रुपये हो गया। ये भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा है।

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