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नॉन परफोर्मिंग एसेट्स (NPA) देश के बैंकों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। इसके बावजूद केंद्र सरकार इस पर कार्रवाई नहीं चाहती है। ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार अपने करीबी उद्योगपतियों को बचाने में लगी हुई है।

एन.पी.ए बैंकों का वो लोन होता है जिसके वापस आने की उम्मीद नहीं होता। इस कर्ज़ में 73% से ज़्यादा हिस्सा उद्योगपतियों का है।

अक्सर उद्योगपति बैंक से कर्ज़ लेकर खुद को दिवालिया दिखा देते हैं और उनका लोन एन.पी.ए में बदल जाता है। यही उस लोन के साथ होता है जिसे बिना चुकाए नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग देश छोड़कर भाग जाते हैं।

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) केंद्रीय सरकार द्वारा बनाई गई उस समिति का हिस्सा बनने के लिए मना कर दिया है जिसे उर्जा क्षेत्र की कंपनियों के लिए बनाया गया है। ताकि समिति उनके लिए एनपीए का पैसा चुकाने का आसान रास्ता निकाल सके। कंपनियों को इस मामले में रियायत दी जा सके।

आरबीआई ने समिति में शामिल ना होने के अपने कारण बताए हैं। केंद्रीय बैंक पहले भी कह चुका है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद वो इस मामले में किसी भी तरह की रियायत देना नहीं चाहता है। मार्च 2018, में अलाहबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उद्योगपतियों को रियायत देने से इंकार कर दिया था।

केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) से उस ‘सर्कुलर’ को वापस लेले जिसके कारण उर्जा क्षेत्र की कंपनियों को बैंकों से लिया लाखों करोड़ का कर्ज़ चुकाना पड़ सकता है। इन कंपनियों पर 1.77 लाख करोड़ का कर्ज है।

दरअसल, आरबीआई ने 12 फरवरी को एक सर्कुलर जारी किया था। उसके मुताबिक, जिन उद्योगपतियों का बैंक लोन एन.पी.ए में बदल चुका है उन्हें 1 मार्च 2018 से 30 सितम्बर तक का समय लोन चुकाने के लिए दिया गया है।

अगर वो समयसीमा में अपना लोन नहीं चुकाते हैं तो 1 अक्टूबर से उनपर कार्रवाई शुरू हो जाएगी। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में उन पर मुकदमा चलाया जाएगा।

मोदी सरकार जो ‘नोटबंदी’ कर ये कहती है कि उसे देश के हित के लिए कड़ा रुख अपनाना सही लगता है। उसके इस कड़े रुख का नतीजा सबसे ज़्यादा आम जनता ने भुगता। लेकिन जब बात आज उद्योगपतियों की है तो उसे आरबीआई की ये कार्रवाई कड़ी लग रही है।

केंद्र सरकार उद्योगपतियों पर इतनी दया तब दिखा रही है जब इनके एन.पी.ए कारण बैंकों का घाटा बढ़ता जा रहा है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सामूहिक शुद्ध घाटा 2017-18 में बढ़कर 87,357 करोड़ रुपये हो गया। ये भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा है।