प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीते साल ढाई करोड़ रोजगार देने के दावे के विपरीत बेरोजगारी का स्तर बढ़ता जा रहा है। खासतौर पर कोरोना महामारी के दौरान लगाए गए लॉकडाउन में लाखों की तादाद में बड़ी और छोटी कंपनियों ने बड़ी तादाद में छंटनी की है।

बात की जाए बिहार की तो विधानसभा चुनाव के दौरान राजद और जदयू ने राज्य के लोगों के लिए रोजगार लाने के बड़े-बड़े दावे किए थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनडीए की सरकार बनने पर लाखों रोजगार देने की बात कही थी।

बिहार में एनडीए की सरकार बनने के बावजूद आज स्थिति ऐसी बन चुकी है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके युवा चपरासी की नौकरी पाने को तरस रहे हैं।

खबर के मुताबिक, बिहार में इस वक्त सरकारी नौकरी के लिए सिर्फ बीटेक की डिग्री वाले छात्र ही नहीं बल्कि एमटेक कर चुके इंजीनियर भी चपरासी, सफाईकर्मी और दरबान बनने के लिए लाइन में लगे हुए हैं।

हाल ही में बिहार विधान परिषद में चपरासी की 96 वैकेंसी निकाली गई है। जिस पर 2 लाख से भी ज्यादा अधिक आवेदन आ चुके हैं। बताया जा रहा है कि इन आवेदकों में सैकड़ों उम्मीदवार हैं। जिनके पास बीटेक और एमटेक की डिग्री है।

भाजपा और जदयू के बड़े दावों के विपरीत बिहार में बेरोजगारी 31.2 फीसदी से बढ़कर 46.6 फीसदी तक पहुंच चुकी है।

चिंताजनक बात यह है कि बिहार की बेरोजगारी की दर, भारत की बेरोजगारी की दर से भी दुगनी है। जोकि 23.5 फीसदी है। लेकिन भाजपा सरकार द्वारा देश से बेरोजगारी को कम करने के संदर्भ में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

साल 2018 से ही देश के युवा सड़कों पर उतरकर मोदी सरकार के खिलाफ रोजगार के मुद्दे पर घेर रहे हैं।

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