संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेष दूतों ने गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के खिलाफ कार्रवाई के संबंध में भारत सरकार को पत्र लिखा है।

पत्र में अपील की गई है कि विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत मानव अधिकारों के लिए बनी एनजीओ के ख़िलाफ़ कथित हमलों को रोका जाए।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सितंबर में संगठन के बैंक खातों से लेन-देन पर रोक लगाए जाने के बाद भारत से अपने सभी कर्मचारियों को हटा लिया था और सभी मानवाधिकार कार्यों को बंद कर दिया था। पत्र में कहा गया था, एमनेस्टी कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करके चुनौती देने की योजना बना रही है।

एमनेस्टी के ख़िलाफ़ सरकार की कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए पत्र में कहा गया कि ये पहले ही तय हो चुका है कि FCRA अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानक के अनुरूप नहीं है। मानवाधिकार संगठनों को FCRA का आवेदन इनके वैध कामों को कलंकित करता है।

पत्र में कहा गया कि एमनेस्टी के ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई सरकार द्वारा एमनेस्टी इंटरनेशनल की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के संभावित प्रयासों की ओर इशारा करता है।

संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूतों ने भारत सरकार से अपने खातों की फ्रीजिंग के लिए कानूनी आधार पर जानकारी मांगी है। साथ ही कोर्ट में सुनवाई के लिए चल रही जांच की संभावित समयसीमा की मांग की है।

उन्होंने भारत सरकार से यह भी पूछा है कि FCRA अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंड और मानकों के अनुकूल कैसे है, और यह सुनिश्चित करने के लिए क्या उपाय किए गए हैं कि धन के लेन-देन की निगरानी के लिए कानून और नीतियां संघों और मानव अधिकारों के रक्षकों की पैसों के उपयोग की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव न डालें।

संयुक्त राष्ट्र के दूतों ने सरकार से 60 दिनों के भीतर जवाब देने की अपील करते हुए कहा है कि अगर समयसीमा का पालन नहीं किया गया, तो 21 अक्टूबर, 2020 के पत्र को सार्वजनिक कर दिया जाएगा। “उन्हें भी बाद में मानव अधिकार परिषद को प्रस्तुत की जाने वाली सामान्य रिपोर्ट में उपलब्ध कराया जाएगा।”

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