पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक आरएसएस कार्यकर्ता की उसकी पत्नी और बेटे समेत हत्या कर दी जाती है। इसपर पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक बवाल होता है और टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर राज्य की सीएम ममता बनर्जी को कटघरे में खड़ा कर घेरना शुरु कर देते हैं।

इस हत्याकांड में टीवी एंकर्स वही काम करते हैं, जो एक पत्रकार को करना चाहिए यानी किसी अव्यवस्था पर सरकार से जवाब तलब करना। मुर्शिदाबाद के जियागंज इलाके में स्थित आरएसएस कार्यकर्ता बंधु प्रकाश पाल के घर में अज्ञात बदमाश घुसते हैं और बंधु प्रकाश सहित उनकी पत्नी और 8 साल के बेटे की निर्मम हत्या कर देते हैं। इस सनसनीखेज़ हत्या के बाद सूबे की कानून व्यवस्था पर सवाल उठना लाज़मी है। जो न्यूज़ चैनल ‘आजतक’ ने पत्रकारिता के सिद्धांतों को निभाते हुए पूरी ज़िम्मेदारी के साथ उठाया।

आजतक ने इस हत्या को लेकर सरकार को घेरने के लिए ‘दंगल’ तक कर डाला। शो का टाइटल रखा गया, “खून से फिर लाल दीदी तेरा बंगाल!” एंकर रोहित सरदाना ने शो के टाइटल को ट्विटर पर शेयर करते पूछा कि, “क्या बच्चों के खून से सींची जाएगी बंगाल की सियासत?” 

हत्या के इस मामले में आजतक और रोहित सरदाना ने सरकार को जिस तरह कटघरे में खड़ा किया है, उससे पत्रकारिता के छात्रों को सबक सीखना चाहिए। अव्यवस्था को लेकर सरकार को इस तरह घेरना बेहद सराहनीय है। लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में आजतक से पत्रकारिता सीखने वाले छात्रों को उत्तर प्रदेश में चैनल की रिपोर्टिंग से सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि यूपी में चैनल के वो तेवर नज़र नहीं आते।

जो चैनल बंगाल में हत्या को लेकर सरकार पर सवाल खड़े करते हुए दंगल करता है, वही चैनल उत्तर प्रदेश में होनी वाली हत्याओं पर चुप्पी साध लेता है। जो चैनल बंगाल में सत्ता को चुनौती देता नज़र आता है, वही यूपी में सत्ता के साथ खड़ा दिखाई देता है। बंगाल में अपराध पर सीएम से सवाल करने वाला चैनल यूपी में पुलिस से सवाल करता है और कभी पुलिस को भी बचाने में जुट जाता है।

झांसी के कथित फेक एनकाउंटर केस पर रिपोर्टिंग को देखकर चैनल के एजेंडे को साफ़ तौर पर समझा जा सकता है। पुलिस पर आरोप लगते हैं कि उसने पुष्पेंद्र यादव को फर्जी मुठभेड़ में मार डाला। सूबे के तमाम बड़े नेता इस मामले को लेकर पुलिस और सरकार पर सवाल खड़े करते हैं। सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो झांसी पहुंचकर धरना भी देते हैं, लेकिन इसके बावजूद आजतक पर कोई दंगल नहीं होता। क्या इसे निष्पक्ष पत्रकारिता कहा जा सकता है?

By: Asif Raza