रोज मर रहें किसानों पर एक भी मंत्री इस्तीफा नहीं देते, मगर मैच हार जाने पर खिलाड़ी पर सन्यास लेने का दबाव बनाया जाता है।

भारत में राजनीति के बाद सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है क्रिकेट। एक ऐसा खेल जिसके दीवाने प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक है। सरकार चाहे किसी की हो मगर क्रिकेट का जलवा कभी कम नहीं होता है। जब तक जीत मिलेगी तब तक सबकुछ ठीक है मगर हारने के बाद जवाबदेही तय की जाने लगती है, रिटायरमेंट लेने का दबाव बनाया जाने लगता है।

ये उसी देश की जवाबदेही है जहां हर रोज किसान आत्महत्या करने को मजबूर है। सरकार के पास इससे जुड़े डेटा उपलब्ध नहीं है। मोदी सरकार अपना पहला कार्यकाल पूरा करके दूसरी बार सरकार में आई। कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से नरेंद्र सिंह तोमर बन गए मगर किसी ने आत्महत्या कर रहे किसानों की समस्या को नहीं सुना।

कर्जमाफी को लेकर सरकार ने बीच का रास्ता निकाला मगर वो भी इतना असर नहीं डाल पाया। पिछले पांच वर्षों में मोदी सरकार ने 5.5 लाख करोड़ रुपये बड़े उद्योगपतियों के माफ किए, लेकिन किसानों के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है।

इसपर मंत्री जवाब देने के बजाय ये कहते हुए नज़र आते है की किसानों की आत्महत्या का मामला कोई नया नहीं है बल्कि ये कांग्रेस की सरकारों से चला आ रहा है। हर बयान पर पिछली सरकारों को दोष देने वाली सरकार से आखिर वैसी जवाबदेही क्यों नहीं है जितनी इस वक़्त में भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी से मांगी जा रही है।

आखिर ऐसा क्यों है की महाराष्ट्र में जब साल 2014 से 2018 के बीच हुई 14,034 आत्महत्या होती है सरकार का कृषि मंत्री नहीं बदलता है, और ना ही केंद्र में किसी भी कृषिमंत्री की जवाबदेही तय होती है। यही हाल हर राज्य का जहां कृषि मंत्रालय किसानों की आत्महत्या पर खामोश रहते है।

गायक लता मंगेशकर धोनी से रिटायरमेंट ना लेने की बात लिख रही है। जो दिखाता है उनका लगाव क्रिकेट के साथ महेंद्र सिंह धोनी से भी बहुत ज्यादा है। धोनी पर न्यूजीलैंड से मैच के बाद से ऐसा कहा जाने लगा है की उन्हें अब रिटायरमेंट ले लेना चाहिए। कुछ ही दिनों में ये मामला राष्ट्र मुद्दा बन जायेगा।

मगर किसानों की आत्महत्या पर सरकार खामोश रहती है। बस सरकार ये कहती है की किसानों की आमदनी दोगुनी करने सहित कई महत्वपूर्ण पहल उसने की हैं। चाहे वो किसानों को सालाना 6000 रुपये देने की बात करती है। मगर इस दावे के पीछे एक और सच ये भी है की अतीत में की गई क़र्ज़ माफ़ी की घोषणाओं से पता चलता है कि यह किसानों की समस्या का हल नहीं है।