अमित शाह के रोड शो के दौरान आज संघी गुंडा दलों ने कलकत्ता में विद्यासागर की एक मूर्ति तोड़ डाली।
संघियों की विद्यासागर से गहरी दुश्मनी है, उसकी वजह भी है। विद्यासागर बंगाली समाज में ब्राह्मणवाद के खिलाफ प्रथम आवाजों में से सबसे सशक्त आवाज थे।

उनकी खुद की शिक्षा संस्कृत में हुई और 25 साल की उम्र में ही उन्हें संस्कृत कॉलेज में शिक्षक का पद भी मिला। लेकिन शिक्षा को संस्कृत और ब्राह्मणों की जकड़ से मुक्त करने के उनके प्रस्ताव के कारण उन्हें 3 साल से कम में ही इस्तीफा देना पड़ा।

इसके बाद फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाते हुए विद्यासागर ने बंगाल की अत्यंत घिनौनी कुलीन ब्राह्मण परंपरा व विधवाओं की दुरावस्था (इनके बारे में अभी यहाँ लिखने का स्थान नहीं पर इसकी भयंकर गंदगी का विस्तृत वर्णन शरतचंद्र ने अपनी कई कहानियों में किया है) के खिलाफ़ और स्त्री शिक्षा व विधवा विवाह के समर्थन में अभियान छेड़ा।

जॉन बेथून ने जब लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल स्थापित करने का प्रयास किया तो ब्राह्मणवादियों के विरोध के मुक़ाबले में विद्यासागर उनके साथ खड़े हुये। 7 मई 1849 को प्रथम स्थायी विद्यालय की स्थापना हुई, जिसके बाद विद्यासागर ने बंगाल भर में ऐसे 35 स्कूल खोले जिनमें 1300 लड़कियों ने प्रवेश लिया।

1855 में विद्यासागर एवं अन्यों के अभियान से ब्राह्मणों के समस्त विरोध के बावजूद विधवा पुनर्विवाह कानून बना। कानून बनने के बाद विद्यासागर ने अपने एकमात्र पुत्र का विवाह एक बाल विधवा से किया और अन्य विवाह आयोजित करने में भी सहयोग दिया।

विद्यासागर ने ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा ब्राह्मणों/मौलवियों द्वारा संचालित संस्कृत पाठशालाओं /फारसी मदरसों को वित्तीय सहायता देने का विरोध किया और सरकारी बजट से बांग्ला/अंग्रेजी माध्यम से आधुनिक विज्ञान एवं अन्य विषयों की सार्वजनिक शिक्षा की मांग उठाई।

बांग्ला भाषा को भी संस्कृत से मुक्त कर आधुनिक रूप देने में विद्यासागर का योगदान है – आधुनिक बांग्ला वर्णमाला को विद्यासागर ने ही अंतिम रूप दिया जिसमें उन्होने कई संस्कृत अक्षरों को निकाल दिया। विद्यासागर की बांग्ला वर्णमाला की प्रारम्भिक पुस्तकें आज भी प्रयोग में हैं। बांग्ला के प्रथम टाइप बनवाकर एक प्रेस भी स्थापित किया जिससे सस्ती पुस्तकें प्रकाशित कर आम लोगों तक पहुंचाया जा सके।

विद्यासागर को 1856 में पुनः संस्कृत कॉलेज में प्रधानाध्यापक बनाया गया तो उन्होने संस्कृत के बजाय बांग्ला व अंग्रेजी माध्यम में सामाजिक एवं प्राकृतिक विज्ञान विषयों की शिक्षा शुरू की तथा कॉलेज में प्रवेश के लिए ब्राह्मण होने की शर्त को रद्द कर दिया। इस कॉलेज का नाम बाद में विद्यासागर कॉलेज रखा गया।

इस कॉलेज के छात्रों ने ही आज जब अमित शाह गो बैक के नारे लगाए तो संघियों ने उनपर पथराव किया और वहाँ लगी विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी। निश्चित रूप से ही विद्यासागर ने जोतिबा फुले की तरह ब्राह्मणवादी विचार का इसके सम्पूर्ण रूप में विरोध नहीं किया, पर जितना किया उसका बांग्ला नवजागरण में अहम योगदान है, और संघियों की उनसे नफरत स्वाभाविक है।

(ये लेख मुकेश असीम की फेसबुक वॉल से ली गई है)