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जेएनयू में फ़ीस बढ़ोतरी को लेकर छात्रों ने दो हफ़्तों से प्रशासन के खिलाफ मुहीम छेड़ रखी है। मीडिया में भी इस मामले को खूब कवरेज मिली है। हालाँकि, कुछ ऐसा ही विरोध-प्रदर्शन पिछले एक महीने से उत्तराखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों के छात्र भी कर रहे हैं। लेकिन इसपर अब तक मीडिया का ध्यान नहीं गया।

दरअसल, साल 2015 में उत्तराखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में करीब तीन गुना फ़ीस बढ़ोतरी कर दी गई थी। कॉलेज के छात्र इसके खिलाफ हाई कोर्ट में गए और उन्होनें अपना केस भी जीत लिया। इस सबके बावजूद इन प्राइवेट कॉलेजों ने अपना फैसला वापस नहीं लिया और छात्रों को विरोध-प्रदर्शन करने पर मजबूर होना पड़ा।

विरोध-प्रदर्शन कर रहे छात्रों का दावा है कि इन आयुर्वेदिक कॉलेजों के करीब 3500 छात्र पिछले 45 दिनों से भूख-हड़ताल पर बैठे हैं। फिर भी सरकार के ‘कान पर जूं नहीं रेंग रही’ है। कुल मिलाकर 13 प्राइवेट कॉलेजों ने कोर्ट के आदेश अनदेखी कर छात्रों से बढ़ी हुई फ़ीस भी वसूल की है।

तस्वीर: फ़ीस बढ़ोतरी पर आया स्टे आर्डर 

आपको बता दें कि आयुर्वेदिक पढ़ाई करने के लिए साल 2015 में फ़ीस 80 हज़ार से बढ़ाकर 2।5 लाख कर दी गयी थी। पिछले साल हाई कोर्ट ने सभी प्राइवेट आयुर्वेदिक कॉलेजों को आदेश दिया था कि वो वसूली गयी फ़ीस छात्रों को वापस कर दें, लेकिन उन्होनें ऐसा किया नहीं।

यूँ तो मेडिकल कॉलेजों की फ़ीस आम तौर पर काफी ज़्यादा ही होती है, लेकिन कोर्ट के फैसले के विपरीत फ़ीस को 300 गुना बढ़ाना अदालत की अवमानना है। इस पूरे मामले के तार देश के दूसरे विश्वविद्यालयों से भी जुड़ते हैं।

जेएनयू में फ़ीस बढ़ोतरी पर लेकर तो विवाद चल ही रहा है, इस साल दिल्ली विश्विद्यालय के कॉलेजों में भी 2 हज़ार से लेकर 8 हज़ार तक की फ़ीस बढ़ोतरी हुई है। छात्रों का कहना है कि ये सब मोदी सरकार की ‘निजीकरण निति’ है जिसकी वजह से हर किसी तक शिक्षा पहुंचने में और बढ़ाएं आ जाएंगी।

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