सोशल मीडिया पर किसी को गालियां देते हुए पूरा दिन बिताने वाले लोगों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। संख्या के साथ ही इनका हौसला भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि किसी भी लिंग, समुदाय या जाति के बारे में कुछ भी आपत्तिजनक टिप्पणी करने के बावजूद कोई ठोस कार्यवाई नहीं होती है। इसी लचर व्यवस्था का फायदा उठाते हुए गालीबाज धीरे-धीरे सारी सीमाएं लांघ जाते हैं और अपशब्दों के इस्तेमाल के साथ-साथ धमकी पर उतर आते हैं।

एक ऐसे ही सांप्रदायिक, जातिवादी और गालीबाज के निशाने पर आईं महिला पत्रकार मीना कोटकल, जिन्हे बेवजह गाली देते हुए परेशान किए जाने लगा।

सुचिता तिवारी के नाम से बने एक टि्वटर अकाउंट पर न सिर्फ उनके बारे में जातिसूचक टिप्पणी लिखी गई, बल्कि परिवार के बैकग्राउंड पर आपत्तिजनक बातें कही गई। फिर आगे एक अन्य ट्वीट में इस टि्वटर यूजर ने एससी समाज की तमाम जातियों का नाम लिखते हुए कहा ‘ये जहां दिखें वहीं इनको मारना चाहिए।’

दलितों को नवबौद्ध बताकर नरसंहार करने वाले इस ट्विटर यूजर ने ब्राम्हण एकता की बात भी की। इसके साथ ही बाबा साहब भीमराव अंबेडकर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए यूज़र ने लिखा- ”2014 के बाद से इनके नाम सुन -सुनकर मेरे कान पक गए हैं।”

दलित समाज से आने वाली एक महिला पत्रकार के लिए और समूचे दलित समाज एवं बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के लिए; आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने वाले इस ट्विटर यूजर का घेराव करते हुए जब पत्रकार मीना कोटवाल ने जवाबी ट्वीट्स लिखने शुरू किए तो हजारों की संख्या में लोग समर्थन दिखाने लगे। हालांकि इस दौरान इस यूज़र ने अपना अकाउंट बंद कर दिया।

बाद में पुलिसिया कार्रवाई की चर्चा चलने पर दोबारा अकाउंट को एक्टिवेट करते हुए यूज़र ने माफी मांगना शुरू कर दिया और अपनी पहचान एक लड़के के रूप में बताते हुए लिखा- “बड़ी बहन मीना कोटवाल मैं आपके पैर छूता हूं। हां, यह फेक अकाउंट बनाया था मुझे माफ कर दो; फॉलोअर के लालच में। मैं बहुत गरीब और कर्ज में डूबा आदमी हूं। कोरोना की वजह से 7 हजार की नौकरी भी चली गई। मैं आपकी मां के पैर छूता हूं, मुझे माफ कर दो। मुझे पश्चाताप करने का एक मौका दे दो।”

हालांकि नफ़रत फैलाने वाले इस गालीबाज को जवाब देते हुए पत्रकार मीना कोटवाल ने लिखा-
“लड़का होकर लड़की के नाम पर अकाउंट बनाते हो, मुझे जातिसूचक, महिला विरोधी गाली देते हो, मेरी मां को गाली देते हो, बाबा साहेब के बारे में आपत्तिजनक ट्वीट करते हो.
तुम्हें माफ करने का मतलब है हजार और लोगों को मौका देना, इनबॉक्स में आकर माफी मांग रहे हो, यह सब करने से पहले सोचा नहीं?”

एक अन्य ट्वीट में मीना ने लिखा-

“इसे छोड़ने का मतलब है, हजार और लोगों को मौका देना. दिनरात कभी जाति के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर हमें गाली देते हैं. इनके अंदर संविधान का डर पैदा करना जरूरी है.

यह देश सबका है, बाबा साहेब का संविधान सबको एकसमान जीने का अधिकार देता है, सबक सीखने के बाद ही इन्हें ये सब समझ आएगा!”

सुचिता तिवारी नाम का ये ट्विटर यूजर लड़का है या लड़की, इस गैरजरूरी बहस से अलग सवाल यह उठता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी नफ़रत भरी बातें लिखकर बच निकलने का आत्मविश्वास इन्हें आता कहां से है?

क्या इन्हें वर्तमान सरकार पर इतना भरोसा है कि हर हाल में गालीबाजों को संरक्षण मिलेगा? क्या इन्हें ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की सुस्ती पर इतना भरोसा है कि जरूरी एक्शन नहीं लिया जाएगा।

जहां सरकारों से सवाल पूछते हुए मामूली ट्वीट करने पर पत्रकारों की गिरफ्तारी हो जाती है वहीं पर जाति, धर्म और लिंग को लेकर दी जा रही गालियों के लिए इतनी छूट क्यों दी जाती है?

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