प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को आगामी विधानसभा चुनावों के कुछ महीने पूर्व वापस लेने की घोषणा की है। इन कानूनों को वापस लेने का समय इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ किसान संगठनों ने कई बार बैठक की, लेकिन तब कोई हल नहीं निकला। मोदी सरकार अपने फैसले पर अड़ी रही और सैकड़ों आंदोलनकारी किसान अपनी जान गंवाते गए। चुनाव नज़दीक आए तो फैसला भी वापस ले लिया गया।

इसपर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ट्वीट कर लिखा, “आंदोलन को ये मुकाम 700 किसानों की शहीदी देकर मिला है। किसान न इस बात को भूलेगा और न ही हुकूमत को भूलने देगा।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु नानक देव जी के प्रकाश महोत्सव पर तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। उन्होनें कहा कि संसद के शीतकालीन सत्र में तीनों कानूनों को रिपील करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा। टिकैत ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि यह किसानों की बहुत बड़ी जीत है। अगर एक साल बाद सरकार ने किसानों की सुध ली है तो इसका श्रेय उन शहीदों को जाता है। जो इस किसान आंदोलन में शहीद हुए हैं। किसान आंदोलन में 700 से ज्यादा किसानों ने अपनी जान गंवाई है। इसका श्रेय उन आदिवासियों, मजदूरों और किसान महिलाओं को जाता है। जो किसान आंदोलन का हिस्सा बने। वह भले ही दिल्ली गए या नहीं।

देशभर में इन ‘शहीद किसानों’ के लिए आवाज़ उठाई जा रही है। शहीद किसानों के लिए कैंडल मार्च निकालते हुए युथ कांग्रेस के नेता श्रीनिवास ने कहा, “सरकारें आएंगी – सरकारें जाएंगी, कानून बनेंगे – कानून बदले जाएंगे लेकिन क्या वो 700 शहीद किसान वापिस आएंगे?”

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता आई.पी. सिंह ने ट्विटर पर लिखा, “हमेशा याद रहे! किसी की ‘दरियादिली’ से नहीं, 700 किसानों की ‘क़ुर्बानी’ और चुनाव में हारने के ‘डर’ से तीन काले कानून वापिस हुए हैं।”

इसी तरह यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और अन्य नेताओं ने भी शहीद किसानों के लिए आवाज़ उठाई है।

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