आज देश की सबसे बड़ी जांच ऐजंसी CBI में चल रहे विवाद की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। यह सुनवाई सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को केंद्र द्वारा जबरन छुट्टी पर भेजे जाने के फैसले के खिलाफ याचिका पर की जा रही है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस रंजग गोगोई ने पूछा कि सीबीआई निदेशक को उसके पद से मुक्त करने से पहले सेलेक्शन कमेटी की सलाह लेने में क्या मुश्किल थी?

इसी सवाल को आगे बढ़ते हुए जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि नियम के अनुसार CBI डायरेक्टर को दो साल तक के लिए पद पर बने रहना चाहिए।

इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि हम उच्च स्तरीय कमेटी के सामने इसलिए नहीं गए क्योंकि यह ट्रांसफर से जुड़ा मामला नहीं था। यदि हम कमेटी के समक्ष जाते तो वो कहती कि यह मामला हमारे सामने  रखा जा रहा है?

CBI निदेशक आलोक वर्मा की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने कहा है कि हर परिस्थिति में उन्हें समिति की सलाह लेनी चाहिए। ट्रांसफर का मतलब सिर्फ एक स्थान के दूसरे स्थान पर स्थानांतरण नहीं होता। केंद्र सरकार के एक आदेश ने आलोक वर्मा के अधिकारों को वापस ले लिया गया।

सीवीसी के आदेशानुसार आलोक वर्मा को भ्रष्टाचार के मामले में जांच से दूर रखा गया। कार्यों के अधिकार से वंचित रखना भी ट्रांसफर है। CBI निदेशक की जिम्मेदारी अंतरिम निदेशक को ट्रांसफर कर दी गई है। यह भी ट्रांसफर ही है। नरीमन ने कहा कि मुद्दा पद पर बने रहना नहीं है, ऑफिस में बने रहना है।

क्या है मामला
दरअसल CBI के निदेशक और विशेष निदेशक ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाएं हैं। इन आरोपों के बाद दोनों ही निदेशकों को जबरन छट्टी पर भेज दिया गया है।

निदेशक आलोक वर्मा ने सरकार द्वारा जबरन छूट्टी पर भेजे जाने के खिलाफ सुप्रीम को कोर्ट में याचिका दायर की थी। आलोक वर्मा की इसी याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।