खुशबू शर्मा

चे का नाम आज भी अमेरिका को असहज कर देता है। 1950 के दशक में जब अमरीका अपनी पूँजी और सैन्य शक्ति के बल पर एशिया, अफ्रीका और लातिन अमरिका के देशों को नव-साम्राज्यवाद की चपेट में ले रहा था, तब लातिनी अमेरीका के एक छोटे से द्वीपीय देश क्यूबा ने उसके सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया।

चे ग्वेरा क्रांति का सपना लेकर पैदा नहीं हुए थे, लातिन अमेरिका की गरीबी और भूखमरी ने चे ग्वेरा को क्रांतिकारी बनाया। चे का जन्म तो अर्जेंटीना में हुआ लेकिन अपने आखिरी समय तक उनके पैर किसी एक जगह पर रूके नहीं। पूँजीवाद आधारित शोषण व्यवस्था को जड़ से ऊखाड़ फेंकने और लातिनी अमरिका के लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने के सपने ने उन्हें कभी आराम नहीं करने दिया।

क्यूबा में फिदेल कास्त्रो के साथ मिलकर अमेरिका का संरक्षण प्राप्त तानाशाह बतिस्ता की सरकार को नस्तेनाबूत कर कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था स्थापित करने के बाद भी वे दूसरे देशों में अपने मिशन को पूरा करने के लिए निकल पड़ते। चे पूँजीवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए कितना बड़ा खतरा थे, इस बात का अंदाजा फिलिप एगी, जो 1957 से 1968 तक सी.आई.ए. (अमेरिका की खुफिया एजेंसी) के एजेंट रह चुके हैं, के इस बयान से लगाया जा सकता है-
“There was no person more feared by the company (CIA) than Che Guevara because he had the capacity and charisma necessary to direct the struggle against the political repression of the traditional hierarchies in power in the countries of Latin America.”

कम्युनिस्ट क्रांति से अमेरिका और उसकी सत्ता के भीतर पैदा हुए डर ने ही 1967 में चे की हत्या करवा दी। लेकिन आज भी वे चे को खत्म नहीं कर पाए हैं। शोषण आधारित व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़, चे की आवाज़ होती है। आज भी चे, क्यूबा ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में पूँजीवाद से लड़ रहे लोगों के दिलों पर राज करते हैं। आज भी वे अमरीकी पूँजीवादी सत्ता के लिए एक बुरे सपने से कम नहीं हैं।

“We must strive every day so that this love of living humanity is transformed into actual deeds, into acts that serve as examples, as a moving force.” -Ernesto Che Guevera❤।

(लेखिका खुशबू शर्मा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा हैं, लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं)

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